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शिव तांडव स्तोत्र

श्री शिव तांडव स्तोत्र— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Shiv Tandav Stotram (Hindi Lyrics, Meaning & PDF)

लंकाधिपति रावण विरचित यह पावन शिव तांडव स्तोत्र देवाधिदेव महादेव के अलौकिक तांडव नृत्य और रौद्र-सौंदर्य की स्तुति कर भक्त को असीम शक्ति, धन-समृद्धि और निर्भयता प्रदान करता है।

रावण६ मिनट पाठ

श्री शिव तांडव स्तोत्र संपूर्ण पाठ

पावन श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित

श्लोक १

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।

डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं

चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥ १॥

भावार्थ: जिनके सघन वन रूपी जटाओं से प्रवाहित होने वाली पावन गंगा जी की जलधारा से जिनका कंठ-प्रदेश परम पवित्र हो रहा है, जिनके गले में विशालकाय भुजंगों (सांपों) की ऊँची मालाएं लटकी हुई हैं, और जो डमरू की डमड्-डमड् ध्वनि के साथ अत्यंत प्रचंड तांडव नृत्य कर रहे हैं — वे परम कल्याणकारी देवाधिदेव भगवान शिव हम सबका सर्वदा कल्याण करें।

श्लोक २

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-

विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।

धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके

किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥ २॥

भावार्थ: घनी जटाओं के विशाल कटोरे में अतिवेग से घूमती हुई देवनदी गंगा की चंचल तरंग-लताओं से जिनका मस्तक सुशोभित है, जिनके विशाल भाल-पटल (ललाट) पर धक-धक करती हुई प्रलयंकारी अग्नि धधक रही है, और जिनके शीश पर बाल-चंद्रमा मुकुट के समान चमक रहे हैं — उन परम प्रभु चंद्रशेखर में मेरी प्रीति और भक्ति प्रतिपल निरंतर बढ़ती रहे।

श्लोक ३

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-

स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।

कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि

क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥ ३॥

भावार्थ: पर्वतराज हिमालय की पावन कन्या माता पार्वती के विलास-पूर्ण कटाक्षों से जिनका मन सदा आनंदित रहता है, जिनकी संपूर्ण दिशाओं तक फैली अनन्त सृष्टि पर जिनका ध्यान सदैव प्रसन्नचित्त रहता है, और जिनकी मात्र एक कृपामयी तिरछी दृष्टि घोर से घोर विपत्तियों को तत्क्षण रोक देती है — उन दिगम्बर (दिग्-वस्त्रधारी) देवाधिदेव महादेव के स्वरूप में मेरा मन परमानंद और विश्राम को प्राप्त करे।

श्लोक ४

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-

कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।

मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥ ४॥

भावार्थ: जटाओं में लिपटे सर्पों के फणों की मणियों से निकलने वाली पीली-लाल आभा से मानो सभी दिशा-रूपी वधुओं के मुख पर कुंकुम का लेप लग गया हो, और मदमस्त गजासुर के चर्म का उत्तरीय (वस्त्र) धारण करने से जिनका श्रीअंग अत्यंत तेजस्वी प्रतीत होता है — उन समस्त भूत-प्राणियों के रक्षक और पोषक भगवान भूतनाथ में मेरा चित्त अलौकिक आनंद को प्राप्त करे।

श्लोक ५

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-

प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः।

भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः

श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥ ५॥

भावार्थ: इंद्र (सहस्रनेत्र) आदि समस्त देवताओं के नतमस्तक होने पर उनके मुकुटों में लगे पुष्पों के पराग-कणों से जिनके चरण-कमल और पादपीठ की भूमि धूसरित (सुगंधित) हो उठती है, जिन्होंने नागराज की माला से अपनी जटाओं का जूड़ा बाँध रखा है — वे मस्तक पर चंद्रमा को धारण करने वाले भगवान शिव हमें चिरकाल के लिए अखंड ऐश्वर्य और आत्मिक सम्पदा प्रदान करें।

श्लोक ६

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-

निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।

सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं

महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥ ६॥

भावार्थ: जिनके ललाट-रूपी वेदी पर प्रज्वलित त्रिनेत्र की प्रचण्ड अग्नि-ज्वालाओं ने कामदेव (पंचबाण) को भस्म कर दिया था, देवराज इंद्र भी जिनके चरणों में श्रद्धा से झुकते हैं, और जिनके मस्तक पर अमृत-किरणों से युक्त चंद्रमा की पावन कला सुशोभित है — उन जटाधारी महाकपाली भगवान शिव की कृपा से हमें समस्त परम सिद्धियाँ और कल्याण प्राप्त हों।

श्लोक ७

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-

द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।

धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥ ७॥

भावार्थ: जिनके विशाल और भयंकर ललाट पर धग-धग जलने वाली अग्नि में कामदेव की आहुति हो गई थी, और जो गिरिराज-पुत्री माता पार्वती के वक्षःस्थल पर सुंदर पत्र-रचना (कस्तूरी-चंदन लेप) करने वाले एकमात्र अद्वितीय शिल्पी हैं — उन त्रिनेत्रधारी भगवान शिव में मेरी अनन्य और अडिग भक्ति बनी रहे।

श्लोक ८

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-

कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः।

निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः

कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥ ८॥

भावार्थ: नवीन सघन मेघमालाओं से घिरी अमावस्या की आधी रात के समान जिनका कंठ-प्रदेश कालकूट विष के प्रभाव से नीलवर्ण होकर अंधकार जैसा सुशोभित है, जो देवनदी गंगा को धारण करने वाले हैं, हाथी की खाल ओढ़ने वाले हैं, और चंद्रमा की कलाओं से मनोहारी लगने वाले संपूर्ण जगत के स्वामी भगवान शिव हमें समस्त ऐश्वर्य और कल्याण प्रदान करें।

श्लोक ९

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-

विडम्बिकण्ठकन्धरारुचिप्रबन्धकन्धरम्।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥ ९॥

भावार्थ: खिले हुए नीले कमल की आभा का तिरस्कार करने वाले अत्यंत श्याम और कांतिमान कंठ वाले, कामदेव का नाश करने वाले, त्रिपुरासुर का वध करने वाले, संसार-बंधन को काटने वाले, दक्ष-यज्ञ का विध्वंस करने वाले, गजासुर व अंधकासुर का दलन करने वाले तथा साक्षात् यमराज (मृत्यु) का भी अंत करने वाले उन कालों के काल भगवान शिव का मैं नित्य भजन करता हूँ।

श्लोक १०

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-

रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं

गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥ १०॥

भावार्थ: जो सर्वमंगला माता पार्वती के संपूर्ण कला-कौशल रूपी कदंब-पुष्पों की मंजरी से बहते हुए रस-माधुर्य का आस्वादन करने के लिए भ्रमर के समान उत्सुक रहते हैं, कामदेव का अंत करने वाले, त्रिपुर का विनाशक, भव-भय से मुक्तिदाता, दक्ष-मख का विध्वंसक, गजासुर और अंधकासुर का संहारक एवं यमराज के भी अंतक — उन देवाधिदेव महादेव को मैं बारंबार भजता हूँ।

श्लोक ११

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-

द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।

धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-

ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥ ११॥

भावार्थ: आकाश में तीव्रता से चक्कर लगाते सर्पों की फुंफकार से जिनके भाल-पटल की प्रलयंकारी अग्नि और अधिक धधक रही है, और मृदंग की धिमिद्-धिमिद्-धिमिद् की गगनभेदी मंगलकारी ध्वनि के ताल पर जिनका अलौकिक व प्रचंड तांडव नृत्य गतिमान हो रहा है — उन सर्वशक्तिमान भगवान शिव की सर्वदा जय हो!

श्लोक १२

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर-

गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।।

तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः

समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे॥ १२॥

भावार्थ: कठोर पत्थर और सुंदर कोमल शय्या में, विषधर सर्प और मोतियों की माला में, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में, तिनके और कमल-नयनों में, तथा साधारण प्रजा और सम्राट में — कब मेरा मन पूरी तरह से समभाव (समान दृष्टि) को प्राप्त करेगा और मैं निष्काम भाव से सदाशिव की अनन्य आराधना कर सकूँगा?

श्लोक १३

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः

शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥ १३॥

भावार्थ: पावन गंगा जी के सुरम्य तट पर किसी निकुंज में निवास करता हुआ, समस्त कुविचारों व वासनाओं से मुक्त होकर, अपने मस्तक पर दोनों हाथ जोड़े, चंचल नेत्रों और मोह-माया को त्यागकर, ललाट पर तिलक लगाए 'शिव-शिव' महामंत्र का निरंतर उच्चारण करते हुए मैं कब परम सुख और शांति को प्राप्त करूँगा?

श्लोक १४

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं

पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति सन्ततम्।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं

विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥ १४॥

भावार्थ: जो भी मनुष्य इस उत्तमोत्तम और अलौकिक शिव स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण अथवा गान करता है, वह निरंतर परम पवित्र और निष्पाप हो जाता है। उसे भगवान शिव और सद्गुरु के चरणों में अतिशीघ्र पराभक्ति प्राप्त होती है तथा उसकी अन्य कोई अधोगति नहीं होती। भगवान शंकर का यह दिव्य चिंतन जीवों के समस्त मोह-जाल और अज्ञान का नाश करने वाला है।

फलश्रुति

पूजाऽवसानसमये दशवक्त्रगीतं

यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।

तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां

लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥ १५॥

भावार्थ: सायंकाल प्रदोष वेला में भगवान शिव की पूजा की समाप्ति पर जो भक्त रावण (दशमुख) द्वारा रचित इस स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करता है, देवाधिदेव महादेव प्रसन्न होकर उसे रथ, हाथी और घोड़ों से परिपूर्ण स्थिर व अनुकूल लक्ष्मी (धन-ऐश्वर्य और वैभव) सदा के लिए प्रदान करते हैं।

श्री शिव तांडव स्तोत्र का महत्व एवं परिचय

भारतीय सनातन वाङ्मय में श्री शिव तांडव स्तोत्र (Shiv Tandav Stotram) को भगवान शिव की सर्वाधिक ओजस्वी, संगीतमय और शक्तिशाली स्तुतियों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह स्तोत्र संस्कृत साहित्य के अत्यंत दुर्लभ और गतिमान ‘पंचचामर छंद’ (ज-र-ज-र-ग-ग) में निबद्ध है। जब इस स्तोत्र का सस्वर पाठ किया जाता है, तो इसकी प्रत्येक पंक्ति से डमरू की तीव्र ताल, घुंघरुओं की झंकार और गंगा की उत्ताल तरंगों का साक्षात् आध्यात्मिक स्पंदन अनुभव होता है।

इस पावन स्तोत्र की रचना परम शिवभक्त और प्रकांड विद्वान लंकाधिपति रावण द्वारा की गई थी। पौराणिक आख्यान के अनुसार, जब रावण ने अपने बाहुबल के मद में आकर देवाधिदेव महादेव के पावन निवास कैलास पर्वत को ही उठा लिया, तब महादेव ने लीलापूर्वक अपने पैर के अँगूठे के अग्रभाग से पर्वत को किंचित दबा दिया। उस प्रचंड भार से रावण की भुजाएँ पर्वत के नीचे दब गईं। अपने अहंकार के चूर्ण होने पर जब रावण को अपनी भूल और महादेव के विराट स्वरूप का बोध हुआ, तब उसने उसी असह्य वेदना के क्षण में अपनी जटाओं की तांत बनाकर और महादेव की स्तुति में इस अप्रतिम स्तोत्र का गान किया।

तांडव वस्तुतः केवल संहार का नृत्य नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन, अहंकार के दलन और आत्म-चेतना के जागरण का दिव्य ब्रह्मांडीय नर्तन है। इस स्तोत्र के माध्यम से साधक महादेव के उस रौद्र-सुंदर स्वरूप से जुड़ता है जहाँ एक ओर भाल पर प्रलयंकारी अग्नि है, तो दूसरी ओर शीश पर अमृतमयी चंद्रमा और पतित-पावनी गंगा। जो भी साधक विशुद्ध हृदय और एकाग्र चित्त से इस स्तोत्र का आश्रय लेता है, उसके जीवन से समस्त भय, दुर्बलता, नकारात्मक ऊर्जा और आंतरिक विकारों का तत्क्षण नाश हो जाता है।

श्री शिव तांडव स्तोत्र पाठ करने की सही विधि एवं नियम

शिव तांडव स्तोत्र का पाठ अत्यंत शक्तिशाली और शीघ्र फल प्रदान करने वाला है। इसके संपूर्ण आध्यात्मिक लाभ हेतु निम्नलिखित शास्त्रीय विधि एवं नियमों का पालन करें:

  1. शुभ समय एवं प्रदोष वेला: नित्य प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में अथवा विशेषकर सायंकाल (प्रदोष काल) में भगवान शिव की पूजा के उपरांत इस स्तोत्र का पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है। सोमवार, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, श्रावण मास (सावन) तथा महाशिवरात्रि पर इसका पाठ अनंत गुना फलदायी होता है।
  2. शुद्धि एवं आसन: स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ श्वेत अथवा हल्के रंग के वस्त्र धारण करें। शांत व पवित्र पूजा स्थल पर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
  3. शिवलिंग व दीप पूजन: भगवान शिव की प्रतिमा, चित्र अथवा पारद/नर्मदेश्वर शिवलिंग के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक और सुगंधित धूप प्रज्वलित करें। शिवलिंग पर जल, गंगाजल, भस्म, श्वेत चंदन, अक्षत और बिल्वपत्र अर्पित करें।
  4. स्पष्ट उच्चारण एवं लय: यह स्तोत्र पंचचामर छंद की द्रुत गति में रचा गया है। अतः प्रत्येक पद का उच्चारण अत्यंत स्पष्ट, शुद्ध और लयबद्ध ध्वनि में करें। पाठ करते समय मन में डमरू की गूँज और महादेव के दिव्य तांडव स्वरूप का ध्यान करते जाएं।
  5. समर्पण एवं विनम्रता का भाव: पाठ करते समय चित्त में किसी प्रकार का दर्प या अहंकार न आने दें। रावण की भाँति ही पूर्ण शरणागति और विनम्र भाव से महादेव के चरण-कमलों में स्वयं को समर्पित करें।

श्री शिव तांडव स्तोत्र पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

नियमित रूप से शुद्ध भाव से शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक आध्यात्मिक, मानसिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • अखंड स्थिर लक्ष्मी एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति: ‘तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः’ — स्तोत्र की फलश्रुति स्पष्ट घोषणा करती है कि प्रदोष वेला में शिव पूजा के उपरांत इसका पाठ करने वाले भक्त को महादेव वाहन, संपत्ति और स्थिर लक्ष्मी का वरदान देते हैं।
  • शत्रु-बाधा, भय एवं संकटों का समूल नाश: ‘स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे’ — काम, त्रिपुर, दक्ष-यज्ञ, गजासुर और काल के भी संहारक महादेव की स्तुति साधक को जीवन के समस्त ज्ञात-अज्ञात भयों, तंत्र-दोषों और शत्रु-बाधाओं से सर्वथा मुक्त कर अभय-दान देती है।
  • समदृष्टि एवं चित्त की परम शांति: ‘समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे’ — बारहवें श्लोक का चिंतन साधक के भीतर पत्थर और शय्या, सर्प और मोती, मित्र और शत्रु के प्रति समभाव जागृत करता है, जिससे मानसिक तनाव और ईर्ष्या-द्वेष का सदा के लिए शमन हो जाता है।
  • वाणी में ओज एवं एकाग्रता का विकास: इस स्तोत्र के क्लिष्ट और छंदोबद्ध संस्कृत श्लोकों के नित्य उच्चारण से साधक की वाणी दोष-मुक्त होकर ओजस्वी बनती है, फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है और बौद्धिक एकाग्रता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।
  • अकाल मृत्यु एवं घोर व्याधियों से रक्षा: महादेव का तांडव रूप काल का भी काल है। इस स्तोत्र के प्रभाव से साधक को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता तथा असाध्य रोगों और मानसिक अवसाद से मुक्ति मिलती है।
  • पराभक्ति एवं शिव-कृपा की प्राप्ति: ‘हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं’ — निरंतर पाठ से साधक के हृदय में सद्गुरु और भगवान शिव के प्रति अनन्य प्रीति जागृत होती है और अंत में वह मोक्ष को प्राप्त करता है।

भगवान शिव के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

देवाधिदेव महादेव शिवशंभु की असीम अनुकंपा और कृपा प्राप्ति हेतु इन पवित्र पाठों का भी नित्य श्रवण व पाठ करें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.शिव तांडव स्तोत्र के रचयिता कौन हैं और इसकी रचना की पौराणिक कथा क्या है?

शिव तांडव स्तोत्र के रचयिता लंकाधिपति रावण हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, जब अहंकारवश रावण ने संपूर्ण कैलास पर्वत को अपनी भुजाओं पर उठाने का प्रयास किया, तब महादेव ने अपने पैर के अँगूठे से पर्वत को दबा दिया। पर्वत के नीचे हाथ दबने पर रावण ने असह्य पीड़ा में भगवान शिव की स्तुति में तत्क्षण इस अद्भुत छंदोबद्ध स्तोत्र की रचना की, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उसे 'रावण' नाम और चंद्रहास खड्ग प्रदान किया।

प्र.शिव तांडव स्तोत्र का पाठ किस समय और किस दिन करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है?

शिव तांडव स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल सूर्योदय के समय अथवा विशेष रूप से सायंकाल प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में करना सर्वोत्तम माना गया है। स्तोत्र की फलश्रुति में कहा गया है — 'पूजाऽवसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे' — अर्थात प्रदोष वेला में शिव पूजा के उपरांत इसका पाठ करने से भगवान आशुतोष शीघ्र प्रसन्न होते हैं। विशेषकर सोमवार, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि और सावन मास में यह पाठ अत्यंत पुण्यदायी है।

प्र.क्या शिव तांडव स्तोत्र के नित्य पाठ से धन, ऐश्वर्य और भयमुक्ति का लाभ मिलता है?

हाँ, शिव तांडव स्तोत्र का नियमित पाठ साधक को समस्त भयों, ग्रह-दोषों और शत्रुओं की बाधाओं से मुक्त करता है। इसके साथ ही अंतिम श्लोक (फलश्रुति) के अनुसार, जो साधक नित्य श्रद्धा से इसका पाठ करता है, महादेव उसे वाहन, भूमि, वैभव और स्थिर लक्ष्मी का वरदान देते हैं — 'तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः'।

प्र.शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करते समय किन मुख्य नियमों और सावधानियों का पालन करना चाहिए?

शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करते समय शरीर और मन की पूर्ण शुद्धि रखें। इसका पाठ पंचचामर छंद में होने के कारण संस्कृत शब्दों का उच्चारण स्पष्ट, लयबद्ध और ओजस्वी होना चाहिए। पाठ के दौरान मन में किसी भी प्रकार का अहंकार न रखें, बल्कि पूर्ण शरणागति व विनम्रता के साथ भगवान भोलेनाथ के तांडव स्वरूप का ध्यान करते हुए पाठ करें।

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