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शिव स्तुति

श्री शिव स्तुति— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Shiv Stuti in Hindi (Hindi Lyrics, Meaning & PDF)

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य विरचित यह पावन वेदसार शिव स्तोत्र देवाधिदेव महादेव के निराकार एवं साकार दोनों रूपों की महिमा का गुणगान कर साधक को मोक्ष और शांति प्रदान करता है।

आदि शंकराचार्य (वेदसार शिव स्तव)६ मिनट पाठ

श्री शिव स्तुति संपूर्ण पाठ

पावन श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित

श्लोक १

पशूनां पतिं पापनाशं परेशं

गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम् ।

जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं

महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ॥ १ ॥

भावार्थ: जो समस्त जीवों (पशुओं) के स्वामी पशुपतिनाथ हैं, समस्त पापों और संतापों का नाश करने वाले परमेश्वर हैं; जो गजराज के चर्म को वस्त्र रूप में धारण करते हैं और जो सर्वश्रेष्‍ठ तथा वरण करने योग्य हैं; जिनके उन्नत जटाजूट के बीच में पतित-पावनी गंगाजी की दिव्य जलधारा सुशोभित हो रही है—उन एकमात्र देवाधिदेव महादेव, कामदेव के भंजक (स्मरारि) का मैं अनन्य भाव से स्मरण करता हूँ।

श्लोक २

महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं

विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम् ।

विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं

सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् ॥ २ ॥

भावार्थ: जो महेश्वर हैं, देवताओं के भी ईश हैं और देवताओं के शत्रुओं (दैत्यों-अहंकारों) का संहार करने वाले हैं; जो सर्वव्यापक, विश्व के स्वामी तथा अपने अंगों पर पावन भस्म को आभूषण रूप में धारण करने वाले हैं; जिनके चंद्रमा, सूर्य और अग्नि रूपी तीन दिव्य नेत्र हैं—उन नित्य आनंदस्वरूप, पंचमुख वाले सर्वसमर्थ प्रभु शिव की मैं स्तुति करता हूँ।

श्लोक ३

गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं

गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम् ।

भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं

भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ॥ ३ ॥

भावार्थ: जो कैलास पर्वत के स्वामी (गिरीश) हैं, समस्त गणों के स्वामी हैं और समुद्र-मंथन का हलाहल विष धारण करने से जिनका कंठ नीलवर्ण (नीलकंठ) है; जो वृषभराज नंदी पर आरूढ़ हैं और तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे गुणातीत हैं; जो संसार के उत्पत्तिकर्ता, परम प्रकाशमान, भस्म विभूषित तथा जगज्जननी माँ भवानी के प्रिय प्राणेश्वर हैं—उन पंचमुख महादेव को मैं श्रद्धापूर्वक भजता हूँ।

श्लोक ४

शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले

महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन् ।

त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूपः

प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ॥ ४ ॥

भावार्थ: हे माँ शिवा (पार्वती) के कांत! हे कल्याणकारी शंभो! हे अपने मस्तक पर अर्धचंद्र को आभूषण बनाने वाले! हे महेश्वर! हे हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले और भव्य जटाधारी प्रभु! आप ही संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं और यह सारा चराचर विश्व आपका ही स्वरूप है। हे परिपूर्ण स्वरूप वाले प्रभु! आप मुझ पर प्रसन्न होइए, मुझ पर सदा कृपा कीजिए।

श्लोक ५

परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं

निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम् ।

यतो जायते पाल्यते येन विश्वं

तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ॥ ५ ॥

भावार्थ: जो परम आत्मा हैं, अद्वितीय हैं, इस समस्त सृष्टि के आदि बीज (मूल कारण) हैं; जो निष्काम, निराकार और केवल ओंकार (प्रणव) के द्वारा ही जानने योग्य हैं; जिनसे यह सारा संसार उत्पन्न होता है, जिनके द्वारा ही इसका पालन-पोषण होता है और अंत में यह संपूर्ण ब्रह्मांड जिनमें ही विलीन हो जाता है—उन परमेश्वर शिव की मैं अनन्य शरण लेता हूँ।

श्लोक ६

न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायुर्-

न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा ।

न चोष्णं न शीतं न देशो न वेषो

न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे ॥ ६ ॥

भावार्थ: जिनके स्वरूप में न पृथ्वी है, न जल, न अग्नि, न वायु और न आकाश है; जहाँ न आलस्य (तंद्रा) है और न निद्रा है; जहाँ न गर्मी है, न ठंड, न कोई सीमा-देश है और न कोई रूप-वेष है; जिनका कोई भौतिक आकार नहीं है, फिर भी जो ब्रह्मा-विष्णु-महेश तीनों रूपों के मूल आधार हैं—उन अलौकिक त्रिमूर्ति स्वरूप भगवान शिव की मैं वंदना करता हूँ।

श्लोक ७

अजं शाश्वतं कारणं कारणानां

शिवं केवलं भासकं भासकानाम् ।

तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं

प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥ ७ ॥

भावार्थ: जो अजन्मा हैं, शाश्वत (सदा विद्यमान) हैं, समस्त कारणों के भी मूल कारण हैं; जो परम कल्याणकारी, अद्वितीय और सूर्य-चंद्र आदि समस्त प्रकाशकों को भी प्रकाशित करने वाले परम ज्योतिर्मय हैं; जो जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति से परे तुरीय अवस्था में स्थित हैं, अज्ञानांधकार से सर्वथा परे हैं और जिनका न कोई आदि है न अंत—उन परम पावन, अद्वैत (भेदभाव रहित) शिव की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

श्लोक ८

नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते

नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते ।

नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य

नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥ ८ ॥

भावार्थ: हे सर्वव्यापी विश्वरूप प्रभु! आपको मेरा बारंबार नमस्कार है। हे चेतन और आनंद के विग्रह रूप! आपको बारंबार प्रणाम है। हे कठिन तपस्या और अष्टांग योग द्वारा प्राप्त होने वाले देवाधिदेव! आपको नमन है। हे वेदों (श्रुतियों) के गूढ़ ज्ञान द्वारा जानने योग्य परम तत्व! आपको मेरा बारंबार सादर नमन है।

श्लोक ९

प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ

महादेव शंभो महेश त्रिनेत्र ।

शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे

त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः ॥ ९ ॥

भावार्थ: हे सर्वसमर्थ प्रभु! हे हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले! हे सर्वव्यापक विश्वनाथ! हे महादेव! हे कल्याणदाता शंभो! हे त्रिनेत्रधारी महेश्वर! हे माँ पार्वती के प्रियतम! हे परम शांत स्वरूप, कामदेव को भस्म करने वाले और त्रिपुरासुर का संहार करने वाले पुरारि! आपके अतिरिक्त इस त्रिलोकी में कोई अन्य न तो वरण करने योग्य है, न पूजनीय है और न ही गणना योग्य है—आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं।

श्लोक १०

शंभो महेश करुणामय शूलपाणे

गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ।

काशीपते करुणया जगदेतदेक-

स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ॥ १० ॥

भावार्थ: हे शंभो! हे महेश्वर! हे करुणामय! हे शूलपाणि! हे गौरीपति! हे पशुपति! हे जीवों के अज्ञान रूपी पाश (बंधन) को काटने वाले! हे पावन काशीपुरी के स्वामी विश्वनाथ! आप ही अपनी अपार करुणा से इस जगत का सृजन करते हैं, आप ही इसका पालन करते हैं और संहार भी करते हैं—सत्य ही आप संपूर्ण सृष्टि के एकमात्र महेश्वर हैं।

श्लोक ११

त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे

त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ ।

त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश

लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन् ॥ ११ ॥

भावार्थ: हे कामारि भव! आपसे ही इस संपूर्ण चराचर जगत का प्राकट्य होता है; हे सुखदाता विश्वनाथ! आप में ही यह समस्त ब्रह्मांड स्थिर रहता है; और हे सर्वेश्वर हर! आप में ही यह संपूर्ण सृष्टि अंत में विलीन हो जाती है। हे निराकार शिवलिंग स्वरूप तथा समस्त चराचर में रमने वाले विश्वरूप शिव! आपको मेरा अनंत कोटि प्रणाम है।

समापन

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य

श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ वेदसारशिवस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

भावार्थ: इस प्रकार जगद्गुरु श्री आदि शंकराचार्य विरचित पावन 'वेदसार शिव स्तोत्र' (श्री शिव स्तुति) संपूर्ण हुआ।

श्री शिव स्तुति (वेदसार शिव स्तोत्र) का महत्व एवं परिचय

भगवान देवाधिदेव महादेव की आराधना में स्तुतियों और स्तोत्रों का स्थान सर्वोपरि माना गया है। जब हृदय में भय, अशांति या जीवन के भंवर में दिशाहीनता का अनुभव हो, तब आशुतोष शिव शंकर की एक निष्कपट स्तुति साधक के अंतःकरण को असीम शांति, साहस और अभय से भर देती है। भगवान शिव केवल विनाश के अधिष्ठाता नहीं हैं, अपितु वे ‘शिव’ हैं—अर्थात जो परम कल्याणकारी, परम शांत और सहज कृपा करने वाले हैं।

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित ‘वेदसार शिव स्तोत्र’ (Vedasara Shiva Stotram), जिसे लोकभाषा में श्रद्धापूर्वक ‘श्री शिव स्तुति’ (Shiv Stuti) कहा जाता है, चारों वेदों के गूढ़ दार्शनिक सार को अत्यंत मधुर और भक्तिरस से परिपूर्ण छंदों में समेटे हुए है। इस स्तुति की विशेषता यह है कि यह भगवान शिव के साकार (सगुण) रूप—जैसे नीलकंठ, त्रिनेत्र, जटाजूट में गंगा, नंदी की सवारी और भस्म श्रृंगार—तथा उनके निराकार (निर्गुण) रूप—जो पंचमहाभूतों, देश-काल और गुणों से परे तुरीय अवस्था में स्थित हैं—दोनों का एक साथ साक्षात्कार कराती है।

जब कोई साधक इस स्तोत्र का एकाग्रचित्त होकर सस्वर पाठ करता है, तो उसके भीतर की नकारात्मक ऊर्जा, संशय और मानसिक अशांति स्वतः विलीन होने लगती है। यह स्तुति अद्वैत ज्ञान की ओर ले जाने वाली तथा जन्म-मरण के भय से मुक्ति दिलाने वाली एक दिव्य आध्यात्मिक नौका के समान है।

श्री शिव स्तुति पाठ करने की सही विधि एवं नियम

भगवान शिव को ‘भोलेनाथ’ और ‘आशुतोष’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है जो बहुत शीघ्र और थोड़ी सी सच्ची भक्ति से भी प्रसन्न हो जाते हैं। शिव स्तुति का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना विशेष फलदायी होता है:

  1. शुभ दिन एवं समय: शिव स्तुति का पाठ नित्य प्रतिदिन किया जा सकता है। विशेष रूप से सोमवार, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि तथा श्रावण (सावन) मास में इसका पाठ अनंत गुना फल देता है। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त अथवा संध्याकाल में गोधूलि/प्रदोष वेला पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।
  2. शुद्धि एवं आसन: स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ श्वेत (सफेद) या हल्के रंग के वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा अथवा ऊनी आसन पर बैठें।
  3. दीप एवं शिवलिंग पूजन: भगवान शिव की प्रतिमा अथवा नर्मदेश्वर शिवलिंग के समक्ष शुद्ध गाय के घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। सुगंधित धूप या अगरबत्ती जलाएं।
  4. पावन अर्पण: शिवलिंग पर शुद्ध गंगाजल, कच्चा दूध या पंचामृत से अभिषेक करें। तत्पश्चात चंदन, अक्षत, श्वेत पुष्प, मंदार (आक), धतूरा, शमीपत्र और त्रिदल बिल्वपत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ बोलते हुए अर्पित करें।
  5. सस्वर पाठ: अब शांत और एकाग्र मन से हाथ में थोड़ा जल लेकर पाठ का संकल्प लें, फिर शांत व शुद्ध उच्चारण के साथ श्री शिव स्तुति के सभी ११ श्लोकों का भावार्थ सहित पाठ करें।
  6. आरती व क्षमा-प्रार्थना: पाठ समापन के पश्चात भगवान शिव की आरती करें और अनजाने में हुई भूल के लिए ‘कर्पूरगौरं करुणावतारं…’ या क्षमा-प्रार्थना मंत्र का उच्चारण करते हुए साष्टांग प्रणाम करें।

श्री शिव स्तुति पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

श्री शिव स्तुति के प्रत्येक श्लोक में असाधारण आध्यात्मिक तरंगे समाहित हैं। इस पावन स्तोत्र के नियमित पाठ से साधक को निम्नलिखित विशेष अनुभूतियाँ व लाभ प्राप्त होते हैं:

  • पापों और बंधनों से मुक्ति: स्तोत्र की प्रथम पंक्ति पशूनां पतिं पापनाशं परेशं के अनुसार, पशुपतिनाथ भगवान शिव का यह पाठ साधक के संचित पापों का क्षय करता है और अज्ञान व सांसारिक बंधनों (पाश) से मुक्त करता है।
  • परमानंद एवं त्रिताप शमन: सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् के ध्यान से दैहिक, दैविक और भौतिक—तीनों ताप शांत होते हैं और अंतरात्मा में अक्षय आनंद का संचार होता है।
  • परम कल्याण और ग्रह-दोष निवारण: भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् का उच्चारण करने से कुंडली के कालसर्प, शनि दोष व राहु-केतु की प्रतिकूलता दूर होकर घर-परिवार में सुख-सौभाग्य की वृद्धि होती है।
  • अद्वैत ज्ञान व मानसिक शांति: न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते… के मनन से साधक को पंचमहाभूतों से परे आत्मतत्व का बोध होता है, जिससे अवसाद, भय और मानसिक भटकाव समाप्त होता है।
  • मोक्ष एवं अभय वरदान: प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् का पाठ करने वाले साधक को भगवान भोलेनाथ की शरण प्राप्त होती है, जिससे अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है और अंत में सद्गति मिलती है।
  • सर्व संकट निवारण व जीवन-रक्षा: काशीपते करुणया जगदेतदेकस्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि यह स्मरण दिलाता है कि सृष्टि के पालनहार और संहारक स्वयं शिव हैं, अतः उनकी शरण में जाने वाले भक्त की रक्षा स्वयं महाकाल करते हैं।

भगवान शिव के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

भगवान शिव की अनन्य कृपा प्राप्त करने के लिए आप चालिसा सागर पर उपलब्ध इन अन्य पावन पाठों का भी नित्य लाभ उठा सकते हैं:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.श्री शिव स्तुति (वेदसार शिव स्तव) के रचयिता कौन हैं?

श्री शिव स्तुति (वेदसार शिव स्तोत्रम्) की रचना अद्वैत वेदांत के महान आचार्य जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी ने की है। इसमें चारों वेदों के सार रूप में भगवान शिव के सगुण और निर्गुण स्वरूप की अत्यंत भावपूर्ण वंदना की गई है।

प्र.शिव स्तुति का पाठ किस दिन और किस समय करना सर्वश्रेष्ठ होता है?

शिव स्तुति का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या संध्याकाल में प्रदोष वेला के समय करना सर्वोत्तम माना जाता है। विशेष रूप से सोमवार, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि और सावन के महीने में इसका पाठ अत्यंत फलदायी होता है।

प्र.शिव स्तुति पाठ करने का मुख्य आध्यात्मिक लाभ क्या है?

इस स्तोत्र की पहली ही पंक्ति 'पशूनां पतिं पापनाशं परेशं' में स्पष्ट है कि यह साधक के समस्त जन्म-जन्मांतर के पापों, अज्ञान और मोह-माया के पाशों (बंधनों) का नाश करती है। इससे मन को अपार शांति, भय से मुक्ति और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

प्र.क्या शिव स्तुति का पाठ गृहस्थ साधक और माताएं-बहनें भी कर सकती हैं?

हाँ, देवाधिदेव महादेव आशुतोष हैं और केवल सच्चे भाव व निर्मल हृदय से प्रसन्न होते हैं। कोई भी गृहस्थ साधक, स्त्री अथवा पुरुष शुद्ध मन और पवित्रता के साथ शिव स्तुति का नित्य पाठ कर सकता है।

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