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अर्गला स्तोत्र

श्री अर्गला स्तोत्र— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Argala Stotram (Hindi Lyrics, Meaning & PDF)

दुर्गा सप्तशती में देवी कवच के पश्चात पढ़ा जाने वाला यह अर्गला स्तोत्र भक्त के जीवन से हर अवरोध हटाकर उसे रूप, विजय, यश और मनोवांछित सिद्धि प्रदान करता है।

ऋषि मार्कण्डेय (मार्कण्डेय पुराण)७ मिनट पाठ

श्री अर्गला स्तोत्र संपूर्ण पाठ

पावन श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित

विनियोग

ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता,

श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥

ॐ नमश्चण्डिकायै॥

मार्कण्डेय उवाच

भावार्थ: इस विनियोग वाक्य में बताया गया है कि अर्गला स्तोत्र के ऋषि साक्षात् भगवान विष्णु हैं, छंद अनुष्टुप् है और अधिष्ठात्री देवी स्वयं महालक्ष्मी हैं; जगदम्बा को प्रसन्न करने तथा दुर्गा सप्तशती पाठ के अंगस्वरूप इसका जप किया जाता है। सबसे पहले माँ चण्डिका को नमन करके महर्षि मार्कण्डेय इस पावन स्तुति का वर्णन आरंभ करते हैं।

श्लोक १

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥ १॥

भावार्थ: हे माता! आप ही जयन्ती (विजय देने वाली), मंगला, काली, भद्रकाली और कपालिनी हैं; आप ही दुर्गा, क्षमा, शिवा और सृष्टि का पालन करने वाली धात्री हैं — आप ही यज्ञ की स्वाहा और पितरों को तृप्त करने वाली स्वधा भी हैं। आपके इन समस्त पावन नामों व रूपों को मेरा बारंबार नमस्कार है।

श्लोक २

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।

जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥ २॥

भावार्थ: हे माँ चामुण्डा! आपकी जय हो। हे समस्त प्राणियों का कष्ट हरने वाली माता! आपकी जय हो। हे सर्वव्यापिनी कालरात्रि स्वरूपा देवी! आपको मेरा सादर प्रणाम है।

श्लोक ३

मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ३॥

भावार्थ: हे मधु और कैटभ नामक असुरों को भगाने वाली, ब्रह्माजी को अभय-वरदान देने वाली माता! आपको नमन है। मुझे सुंदर स्वरूप, विजय और यश प्रदान कीजिए तथा मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक ४

महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ४॥

भावार्थ: हे महिषासुर का समूल नाश करने वाली और अपने भक्तों को सुख देने वाली माता! आपको नमन है। मुझे रूप, विजय, यश प्रदान कीजिए और मेरे विरोधियों को शांत कीजिए।

श्लोक ५

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ५॥

भावार्थ: हे रक्तबीज असुर का वध करने वाली और चण्ड-मुण्ड नामक दैत्यों का विनाश करने वाली देवी! मुझे सुंदरता, विजय, यश प्रदान कीजिए और मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक ६

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ६॥

भावार्थ: हे शुम्भ, निशुम्भ और धूम्राक्ष जैसे अहंकारी दैत्यों का मर्दन करने वाली माता! मुझे रूप, विजय, यश दीजिए और मेरे द्वेषियों का नाश कीजिए।

श्लोक ७

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ७॥

भावार्थ: हे देवी! आपके चरण-युगल की समस्त देवगण वंदना करते हैं, और आप ही सबको सौभाग्य प्रदान करने वाली हैं। मुझे भी रूप, विजय, यश प्रदान कर मेरे शत्रुओं का शमन कीजिए।

श्लोक ८

अचिन्त्यरुपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ८॥

भावार्थ: हे अचिन्त्य और अद्भुत चरित्र वाली, समस्त शत्रुओं का विनाश करने वाली माता! मुझे सुंदर रूप, विजय, यश दीजिए और मेरे द्वेषियों का नाश कीजिए।

श्लोक ९

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ९॥

भावार्थ: हे चण्डिके! जो भक्त सदा श्रद्धा-भक्ति से आपको नमन करते हैं, उनके समस्त पाप और कष्ट आप हर लेती हैं। मुझे भी रूप, विजय, यश देकर मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक १०

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १०॥

भावार्थ: हे चण्डिके! जो भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करते हैं, उनके सभी रोग और व्याधियां आप नष्ट कर देती हैं। मुझे रूप, विजय, यश प्रदान कर मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक ११

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ ११॥

भावार्थ: हे चण्डिके! जो साधक निरंतर भक्तिभाव से इस लोक में आपकी अर्चना करते हैं, उन पर आपकी विशेष कृपा सदा बनी रहती है। मुझे भी रूप, विजय, यश देकर मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक १२

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १२॥

भावार्थ: हे माता! मुझे सौभाग्य और उत्तम आरोग्य प्रदान कीजिए तथा परम सुख दीजिए। साथ ही मुझे रूप, विजय, यश देकर मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक १३

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १३॥

भावार्थ: हे माता! मेरे शत्रुओं और द्वेषियों का नाश कीजिए तथा मुझे उत्तम बल-सामर्थ्य प्रदान कीजिए। मुझे रूप, विजय, यश दीजिए और विरोधियों का नाश कीजिए।

श्लोक १४

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १४॥

भावार्थ: हे देवी! मेरा कल्याण कीजिए और मुझे परम ऐश्वर्य-सम्पन्नता प्रदान कीजिए। मुझे रूप, विजय, यश देकर मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक १५

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १५॥

भावार्थ: हे अम्बिके! देवताओं और असुरों — दोनों के मुकुटों के रत्न आपके चरणों में झुककर स्पर्श करते हैं, अर्थात सभी आपके चरणों में नतमस्तक हैं। मुझे भी रूप, विजय, यश प्रदान कीजिए तथा मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक १६

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १६॥

भावार्थ: हे माता! मुझे विद्यावान, यशस्वी और लक्ष्मीवान (धन-वैभव संपन्न) बना दीजिए। मुझे रूप, विजय, यश दीजिए और मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक १७

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १७॥

भावार्थ: हे चण्डिके! आप प्रचण्ड दैत्यों के अहंकार का नाश करने वाली हैं; मैं आपके चरणों में नतमस्तक हूँ। मुझे रूप, विजय, यश प्रदान कीजिए और मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक १८

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १८॥

भावार्थ: हे चतुर्भुजा परमेश्वरी! स्वयं चार मुख वाले ब्रह्माजी भी आपकी स्तुति करते हैं। मुझे भी रूप, विजय, यश प्रदान कीजिए तथा मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक १९

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १९॥

भावार्थ: हे अम्बिके! भगवान श्रीकृष्ण भी सदा भक्तिभाव से आपकी स्तुति करते हैं। मुझे भी रूप, विजय, यश प्रदान कीजिए और मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक २०

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २०॥

भावार्थ: हे परमेश्वरी! हिमाचल-पुत्री पार्वती के स्वामी भगवान शिव भी सदा आपकी स्तुति करते हैं। मुझे रूप, विजय, यश दीजिए और मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक २१

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २१॥

भावार्थ: हे परमेश्वरी! इन्द्राणी के पति देवराज इन्द्र भी सद्भावपूर्वक आपकी पूजा करते हैं। मुझे भी रूप, विजय, यश प्रदान कीजिए और मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक २२

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २२॥

भावार्थ: हे देवी! आप अपनी प्रचण्ड भुजाओं के बल से दैत्यों के अहंकार का विनाश करने वाली हैं। मुझे रूप, विजय, यश दीजिए और मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक २३

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २३॥

भावार्थ: हे अम्बिके! आप अपने भक्तजनों को अपार आनंद प्रदान करने वाली हैं। मुझे भी रूप, विजय, यश देकर मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

श्लोक २४

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।

तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥ २४॥

भावार्थ: हे माता! मुझे मन के अनुकूल आचरण करने वाली, मनोहर और सुशील पत्नी प्रदान कीजिए, जो कुलीन हो और मुझे इस दुर्गम संसार-सागर से पार उतारने में सहायक बने।

श्लोक २५

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।

स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥ २५॥

भावार्थ: जो साधक पहले इस अर्गला स्तोत्र का पाठ करके तत्पश्चात दुर्गा सप्तशती के महास्तोत्र का पाठ करता है, उसे संपूर्ण सप्तशती-पाठ के समान ही समस्त संपदाओं और श्रेष्ठ वरदानों की प्राप्ति होती है।

श्री अर्गला स्तोत्र का महत्व एवं परिचय

‘अर्गला’ शब्द का अर्थ है दरवाज़े को बंद रखने वाली वह लकड़ी की छड़ या साँकल, जो भीतर और बाहर के बीच एक अवरोध बनाकर खड़ी रहती है। जीवन में भी अक्सर ऐसा ही होता है — मेहनत पूरी होती है, नीयत साफ होती है, फिर भी सफलता, सम्मान या मनचाहा परिणाम किसी अदृश्य ‘अर्गला’ से रुका हुआ प्रतीत होता है। इसी अवरोध को हटाने के लिए भगवती से सीधी, निःसंकोच प्रार्थना करने वाला यह स्तोत्र दुर्गा सप्तशती की सबसे प्रिय और प्रभावशाली रचनाओं में गिना जाता है।

श्री अर्गला स्तोत्र (Shri Argala Stotram) मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) का एक अनिवार्य अंग है। परंपरा के अनुसार सप्तशती पाठ आरंभ करने से पूर्व पहले देवी कवच से सुरक्षा-कवच धारण किया जाता है, और उसके तुरंत बाद यही अर्गला स्तोत्र पढ़ा जाता है — मानो कवच से सुरक्षित होने के बाद अब भक्त निर्भय होकर देवी से सीधे अपनी इच्छाएं मांग रहा हो। पच्चीस श्लोकों की इस लघु किन्तु अत्यंत सशक्त रचना में इक्कीस श्लोक एक ही दृढ़ पुकार पर समाप्त होते हैं — ‘रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि’ अर्थात ‘हे माता! मुझे रूप दो, विजय दो, यश दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो।’

इस स्तोत्र की विशेषता इसकी निडरता में है। यहाँ भक्त संकोचवश धीमे स्वर में विनती नहीं करता, बल्कि जयन्ती, मंगला, काली, चामुण्डा, कालरात्रि जैसे भगवती के प्रचंड रूपों का बारंबार स्मरण करते हुए स्पष्ट शब्दों में रूप, आरोग्य, विद्या, लक्ष्मी, सुयोग्य जीवनसाथी और शत्रु-नाश—सब कुछ एक साथ मांग लेता है। यही कारण है कि जिस भी साधक के जीवन में आत्मविश्वास की कमी, बार-बार असफलता, या किसी कार्य में अनावश्यक विलंब जैसी ‘अर्गला’ लगी हो, उसके लिए यह स्तोत्र वर्षों पुराने अवरोधों को भी शीघ्र हटाने वाला माना गया है।

श्री अर्गला स्तोत्र पाठ करने की सही विधि एवं नियम

अर्गला स्तोत्र का पाठ अत्यंत सरल है, परंतु सप्तशती-परंपरा में इसका एक निश्चित क्रम और कुछ नियम बताए गए हैं:

  1. पाठ-क्रम: यदि संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ करना हो, तो पहले देवी कवच, उसके तुरंत बाद अर्गला स्तोत्र, और फिर कीलक स्तोत्र पढ़कर ही सप्तशती के तेरह अध्यायों में प्रवेश करें। स्वतंत्र रूप से केवल अर्गला स्तोत्र का पाठ भी किया जा सकता है।
  2. शुभ दिन एवं काल: मंगलवार, शुक्रवार तथा शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि के नौ दिन इस पाठ हेतु सर्वाधिक शुभ माने गए हैं। प्रातःकाल स्नान के पश्चात ब्रह्म मुहूर्त में पाठ करना सर्वोत्तम है।
  3. दिशा एवं आसन: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल अथवा पीले रंग के स्वच्छ आसन पर बैठें।
  4. पूजन सामग्री: माँ दुर्गा के चित्र या प्रतिमा के समक्ष घी का दीपक जलाएं, लाल पुष्प, अक्षत, कुमकुम और लाल चुनरी अर्पित करें।
  5. उच्चारण: संस्कृत श्लोकों का उच्चारण स्पष्ट, शुद्ध और श्रद्धापूर्वक करें; प्रत्येक श्लोक के अंत में आने वाले ‘रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि’ पद को विशेष भाव से दोहराएं, क्योंकि यही इस स्तोत्र का सार है।

श्री अर्गला स्तोत्र पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

अर्गला स्तोत्र के नियमित एवं श्रद्धापूर्वक पाठ से साधक के जीवन में निम्नलिखित प्रत्यक्ष परिवर्तन देखे जाते हैं:

  • आत्मविश्वास व आकर्षक व्यक्तित्व की प्राप्ति: ‘रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि’ — इक्कीस बार दोहराई गई इस प्रार्थना से साधक के मुखमंडल पर तेज और आत्मविश्वास में स्पष्ट वृद्धि होती है।
  • हर कार्य में विजय एवं यश की प्राप्ति: प्रत्येक श्लोक में ‘जयं देहि’ और ‘यशो देहि’ की पुनरावृत्ति परीक्षा, साक्षात्कार, न्यायालय अथवा प्रतिस्पर्धा जैसे हर क्षेत्र में विजय और सम्मान दिलाने वाली मानी गई है।
  • विद्या, आरोग्य और धन-समृद्धि: ‘विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु’ — यह श्लोक स्पष्ट रूप से विद्या, यश और लक्ष्मी तीनों की एक साथ प्राप्ति का वरदान मांगता है।
  • शत्रु-बाधा और नकारात्मकता का शमन: ‘द्विषो जहि’ का बारंबार उच्चारण शत्रुओं, ईर्ष्यालु व्यक्तियों तथा गुप्त शत्रुताओं से रक्षा करता है।
  • सुयोग्य एवं सुखी वैवाहिक जीवन: ‘पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्’ — विवाह में विलंब अथवा दांपत्य कलह की स्थिति में यह श्लोक विशेष रूप से सहायक माना जाता है।
  • सप्तशती-पाठ के समान संपूर्ण फल: ‘स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्’ — जो साधक इसे सप्तशती पाठ के साथ जोड़कर पढ़ता है, उसे संपूर्ण सप्तशती-पाठ जितना ही पुण्य-फल प्राप्त होता है।

माँ दुर्गा के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

आदिशक्ति भगवती की संपूर्ण कृपा प्राप्ति हेतु इन पवित्र पाठों का भी नित्य पाठ करें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.अर्गला स्तोत्र का पाठ किस क्रम में और किस दिन करना चाहिए?

दुर्गा सप्तशती पाठ की परंपरा में देवी कवच के तुरंत बाद और १३ अध्यायों तथा कीलक स्तोत्र से पहले अर्गला स्तोत्र का पाठ किया जाता है। स्वतंत्र रूप से भी इसका नित्य पाठ किया जा सकता है, परंतु मंगलवार, शुक्रवार और विशेषकर शारदीय व चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में इसका पाठ सर्वाधिक फलदायी माना गया है।

प्र.अर्गला स्तोत्र का शाब्दिक अर्थ क्या है और यह क्यों पढ़ा जाता है?

'अर्गला' का अर्थ है दरवाज़े की वह छड़ या साँकल जो रास्ता रोके रहती है। यह स्तोत्र जीवन में इच्छापूर्ति के मार्ग में लगी हुई ऐसी ही अदृश्य 'अर्गला' (बाधा) को हटाने के लिए पढ़ा जाता है। इसी भाव से हर श्लोक 'रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि' — अर्थात 'मुझे रूप दीजिए, विजय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का नाश कीजिए' — इस स्पष्ट एवं साहसिक प्रार्थना के साथ समाप्त होता है।

प्र.क्या अर्गला स्तोत्र से विवाह में आ रही बाधाएं और वैवाहिक जीवन की समस्याएं दूर होती हैं?

हाँ, अर्गला स्तोत्र में इसका स्पष्ट उल्लेख है। चौबीसवें श्लोक में साधक प्रार्थना करता है — 'पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्' अर्थात मुझे मन के अनुकूल, सुशील और मनोहर जीवनसाथी प्रदान कीजिए। इसीलिए विवाह में विलंब, जीवनसाथी से मतभेद अथवा दांपत्य सुख में कमी होने पर इसका श्रद्धापूर्वक पाठ विशेष लाभकारी माना जाता है।

प्र.क्या अर्गला स्तोत्र को दुर्गा सप्तशती के बिना, अकेले भी पढ़ा जा सकता है?

हाँ, अर्गला स्तोत्र का पाठ स्वतंत्र रूप से भी किया जा सकता है और यह बाधा-निवारण व विजय-प्राप्ति के लिए तुरंत फलदायी है। स्वयं स्तोत्र के पच्चीसवें श्लोक में कहा गया है — 'इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः, स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्' — अर्थात जो इसे पढ़कर सप्तशती के मूल पाठ (महास्तोत्र) तक भी पढ़ता है, उसे संपूर्ण सप्तशती-पाठ के समान ही फल प्राप्त होता है, जो इसके पूर्ण प्रभाव को दर्शाता है।

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