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महालक्ष्मी अष्टक

श्री महालक्ष्म्यष्टकम्— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Mahalakshmi Ashtakam (Hindi Lyrics, Meaning & PDF)

पद्म पुराण में वर्णित देवराज इन्द्र द्वारा विरचित श्री महालक्ष्म्यष्टकम् का नित्य पाठ जीवन से दरिद्रता, भय और विघ्नों का समूल नाश कर सुख, वैभव एवं अक्षय लक्ष्मी प्रदान करता है।

देवराज इन्द्र (पद्म पुराण)५ मिनट पाठ

श्री महालक्ष्म्यष्टकम् संपूर्ण पाठ

८ पावन श्लोक एवं दोहा सरल हिंदी भावार्थ सहित

श्लोक १

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते ।

शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥

भावार्थ: हे महामाये! हे श्रीपीठ पर विराजमान और समस्त देवताओं द्वारा नित्य पूजित भगवती! अपने हाथों में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली हे माँ महालक्ष्मी! आपको मेरा कोटि-कोटि नमन है।

श्लोक २

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि ।

सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥

भावार्थ: गरुड़ पर सवार होने वाली और कोलासुर नामक दैत्य का संहार कर उसका भय दूर करने वाली, भक्तों के समस्त पापों और संतापों को हरने वाली हे देवी महालक्ष्मी! आपको मेरा सादर प्रणाम है।

श्लोक ३

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयंकरि ।

सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥

भावार्थ: सब कुछ जानने वाली सर्वज्ञा, सभी मनोवांछित वरदान देने वाली, समस्त दुष्टों व नकारात्मक शक्तियों का दमन करने वाली और जीवन के सारे दुःखों का निवारण करने वाली हे माँ महालक्ष्मी! आपको मेरा बारंबार नमन है।

श्लोक ४

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।

मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥

भावार्थ: अलौकिक सिद्धियाँ और सद्बुद्धि प्रदान करने वाली, सांसारिक सुख-भोग तथा परम मोक्ष दोनों का वरदान देने वाली, साक्षात् मंत्रों के विग्रह स्वरूप में विराजमान हे माँ महालक्ष्मी! आपको मेरा नमन है।

श्लोक ५

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि ।

योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥

भावार्थ: आदि और अंत से रहित, सृष्टि की मूल आदिशक्ति, परम महेश्वरी तथा योग से प्रादुर्भूत एवं योगियों के हृदय में वास करने वाली हे भगवती महालक्ष्मी! आपको मेरा प्रणाम है।

श्लोक ६

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे ।

महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥

भावार्थ: स्थूल, सूक्ष्म और दुष्टों के लिए महारौद्र रूप धारण करने वाली, अपार शक्ति व विशाल उदर (जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाया है) वाली तथा घोर से घोर पापों को भी नष्ट कर देने वाली हे देवी महालक्ष्मी! आपको मेरा नमन है।

श्लोक ७

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि ।

परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥

भावार्थ: दिव्य कमल के आसन पर विराजमान, साक्षात् परब्रह्म के स्वरूप वाली, परम ईश्वरी और संपूर्ण संसार का पालन करने वाली हे जगन्माता महालक्ष्मी! आपको मेरा सादर नमन है।

श्लोक ८

श्वेताम्बरधरे देवि नानालंकारभूषिते ।

जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥

भावार्थ: शुभ्र श्वेत वस्त्र धारण करने वाली, विविध दिव्य आभूषणों और मणियों से सुशोभित, संपूर्ण चराचर जगत में व्याप्त रहने वाली हे विश्वमाता महालक्ष्मी! आपको मेरा बारंबार प्रणाम है।

फलश्रुति

महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान्नरः ।

सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥ ९ ॥

भावार्थ: जो भी श्रद्धालु जन भक्तिभाव से परिपूर्ण होकर इस पावन महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, वह जीवन में समस्त सिद्धियाँ प्राप्त करता है और उसे सदा ऐश्वर्य, पद व प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।

फलश्रुति

एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् ।

द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः ॥ १० ॥

भावार्थ: जो नित्य प्रति एक समय (प्रातःकाल) इसका पाठ करता है, उसके बड़े से बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। जो प्रतिदिन दोनों समय (प्रातः व सायं) पाठ करता है, वह धन-धान्य और समृद्धि से संपन्न हो जाता है।

फलश्रुति

त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् ।

महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥ ११ ॥

भावार्थ: जो प्रतिदिन तीनों समय (त्रिकाल - प्रातः, मध्याह्न और सायं) इसका पाठ करता है, उसके प्रबल शत्रुओं का नाश होता है और कल्याणमयी माँ महालक्ष्मी उस पर सदा प्रसन्न होकर वरदान देने के लिए उपस्थित रहती हैं।

श्री महालक्ष्म्यष्टकम् का महत्व एवं परिचय

सनातन धर्म में भगवती महालक्ष्मी को ऐश्वर्य, वैभव, सौभाग्य, अन्न, धन और आत्मिक शांति की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। जब जीवन में निरंतर आर्थिक विषमताएँ घेर लें, व्यापार या आजीविका में गतिरोध उत्पन्न हो जाए, और मन अज्ञात दरिद्रता या अभाव के भय से व्याकुल रहने लगे, तब माँ महालक्ष्मी का पावन स्मरण ही जीवन में स्थिरता, प्रकाश और संपन्नता का संचार करता है। माँ केवल भौतिक धन देने वाली देवी नहीं हैं, बल्कि वे साधक को धर्मानुकूल आचरण, यश, आरोग्य और सद्बुद्धि भी प्रदान करती हैं।

श्री महालक्ष्म्यष्टकम् (Shri Mahalakshmi Ashtakam) की रचना का उल्लेख ‘पद्म पुराण’ के पावन प्रसंगों में मिलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब देवराज इन्द्र ने महर्षि दुर्वासा के शाप के फलस्वरूप तीनों लोकों का राज्य, तेज और संपूर्ण ऐश्वर्य खो दिया था, तब उन्होंने अपनी समस्त आशाओं को त्यागकर अनन्य शरणागति भाव से भगवती महालक्ष्मी की यह अष्टक स्तुति की थी। देवराज के आर्तनाद और भक्ति से द्रवीभूत होकर माँ महालक्ष्मी ने समुद्र मंथन के समय दिव्य कमल पर आरूढ़ होकर दर्शन दिए और देवताओं को पुनः उनका स्वर्णिम वैभव प्रदान किया।

यह पावन स्तोत्र केवल आठ श्लोकों और तीन फलश्रुति छंदों में माँ महालक्ष्मी के विराट, करुणामय और सर्वशक्तिमान स्वरूप को प्रकट करता है। शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली, गरुड़ पर विराजने वाली और कमल के आसन पर सुशोभित माँ महालक्ष्मी का यह स्तोत्र साधक के अंतःकरण से नकारात्मकता को दूर कर घर-परिवार में मांगलिक ऊर्जा और स्थायी सुख की स्थापना करता है।

श्री महालक्ष्म्यष्टकम् पाठ करने की सही विधि एवं नियम

महालक्ष्म्यष्टकम् का पाठ अत्यंत सरल और सात्विक है। इसकी पूर्ण शुभ फलप्राप्ति के लिए शास्त्रों में कुछ विशेष नियम और विधियाँ बताई गई हैं:

  1. शुभ दिन एवं काल: यों तो इसका नित्य पाठ परम कल्याणकारी है, परंतु शुक्रवार, पूर्णिमा तिथि, दीपावली, धनतेरस और गुप्त नवरात्र के दिनों में इसका पाठ विशेष रूप से प्रभावशाली होता है। प्रातःकाल स्नान के उपरांत या संध्याकाल में दीप प्रज्वलन के समय पाठ करना चाहिए।
  2. दिशा एवं आसन: पूजा स्थल पर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। लाल, पीले अथवा श्वेत रंग के स्वच्छ ऊनी या कुशा के आसन का प्रयोग करें।
  3. दीपक एवं पूजा सामग्री: माँ महालक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र के समक्ष गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। सुगंधित धूप, लाल पुष्प (विशेषकर कमल अथवा लाल गुलाब), रोली, अक्षत और चंदन माँ को अर्पित करें।
  4. नैवेद्य (भोग): माँ लक्ष्मी को मिश्री, मखाने की खीर, बताशे अथवा सफेद मिष्ठान्न का भोग अत्यंत प्रिय है। यदि संभव न हो तो शुद्ध जल और फल भी अर्पित किए जा सकते हैं।
  5. शुद्ध उच्चारण एवं एकाग्रता: संस्कृत श्लोकों का उच्चारण धीमे स्वर में, स्पष्ट और भावपूर्ण तरीके से करें। पाठ समाप्त होने के पश्चात माँ से क्षमा-प्रार्थना करें और परिवार के कल्याण की कामना करें।

श्री महालक्ष्म्यष्टकम् पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

महालक्ष्म्यष्टकम् का निष्ठापूर्वक पाठ करने से साधक के जीवन में चमत्कारी आध्यात्मिक और भौतिक परिवर्तन आते हैं। इस स्तोत्र के प्रत्येक छंद में असीम कृपा छिपी हुई है:

  • पापों और दुर्भाग्य का समूल निवारण: ‘एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्’ — प्रतिदिन प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक एक बार पाठ करने से साधक के जाने-अनजाने में किए गए पापों का क्षय होता है और दुर्भाग्य दूर भागता है।
  • धन-धान्य और अक्षय समृद्धि की प्राप्ति: ‘द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः’ — जो साधक प्रतिदिन सुबह और शाम दोनों समय इसका पाठ करते हैं, उनके घर में कभी भी अन्न और धन की कमी नहीं होती तथा व्यापार में उन्नति होती है।
  • शत्रु-बाधा का नाश एवं माँ का स्थायी वरदान: ‘त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् । महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा’ — त्रिकाल (तीनों प्रहर) पाठ करने से समस्त आंतरिक (क्रोध, लोभ) और बाह्य विरोधियों का शमन होता है तथा माँ लक्ष्मी सदा प्रसन्न होकर वरदान देती हैं।
  • सांसारिक सुख और परम मोक्ष का समन्वय: ‘सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि’ — यह स्तोत्र साधक को इस संसार के उत्तम सुख-सुविधाओं (भोग) का आनंद देते हुए अंत में मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करता है।
  • अष्ट सिद्धियों और समाज में प्रतिष्ठा: ‘सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा’ — नियमित पाठ करने से व्यक्ति के संकल्प सिद्ध होते हैं और उसे समाज में उच्च पद, यश तथा सम्मान प्राप्त होता है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र का नित्य पाठ किस दिन और समय करना सबसे शुभ माना जाता है?

महालक्ष्म्यष्टकम् का पाठ प्रत्येक शुक्रवार, पूर्णिमा तिथि, दीपावली और धनतेरस पर करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। नित्य नियम के रूप में इसका पाठ प्रातःकाल सूर्योदय के समय (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्याकाल में दीप प्रज्वलन के समय करना सर्वश्रेष्ठ होता है। शांत चित्त से उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके पाठ करने से शीघ्र सिद्धि मिलती है।

प्र.महालक्ष्मी अष्टकम स्तोत्र की रचना किसने की थी और इसका पौराणिक संदर्भ क्या है?

श्री महालक्ष्म्यष्टकम् की रचना देवराज इन्द्र द्वारा की गई थी, जिसका प्रामाणिक वर्णन 'पद्म पुराण' के उत्तरखंड में मिलता है। जब महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण इन्द्रदेव का स्वर्गलोक श्रीहीन और वैभवविहीन हो गया था, तब उन्होंने देवी महालक्ष्मी की इसी पावन स्तुति से आराधना की थी। इस स्तुति से प्रसन्न होकर माँ महालक्ष्मी ने समुद्र मंथन से प्रकट होकर देवताओं को उनका खोया हुआ वैभव पुनः प्रदान किया था।

प्र.महालक्ष्मी अष्टकम का दिन में एक, दो या तीन बार पाठ करने से क्या अलग-अलग फल मिलते हैं?

स्तोत्र की फलश्रुति में स्पष्ट कहा गया है: 'एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्' अर्थात एक बार पाठ करने से पापों का नाश होता है; 'द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः' अर्थात दो बार पाठ करने से धन-धान्य की प्रचुरता होती है; और 'त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्' अर्थात तीनों प्रहर पाठ करने से समस्त शत्रुओं व विघ्नों का नाश होकर माँ लक्ष्मी की स्थायी कृपा प्राप्त होती है।

प्र.क्या गृहस्थ जीवन में नियमित रूप से महालक्ष्मी अष्टकम का पाठ किया जा सकता है?

हाँ, गृहस्थ साधकों के लिए महालक्ष्मी अष्टकम एक अत्यंत सुगम, प्रभावशाली और सात्विक स्तोत्र है। इसके लिए किसी अत्यंत कठिन तांत्रिक नियम की आवश्यकता नहीं होती। शुद्ध मन, पवित्र वस्त्र, गाय के घी का दीपक और निष्कपट भक्ति के साथ कोई भी पुरुष, स्त्री या परिवार इसका पाठ अपने घर के पूजा स्थल पर कर सकता है।

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