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द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र

श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Dwadash Jyotirlinga Stotram (Hindi Lyrics, Meaning & PDF)

आदि शंकराचार्य कृत यह पावन द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र भगवान शिव के १२ दिव्य ज्योतिर्लिंगों की अलौकिक महिमा का गान कर जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश करता है।

आदि शंकराचार्य५ मिनट पाठ

श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र संपूर्ण पाठ

पावन श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित

श्लोक १

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्।

भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये॥ १॥

भावार्थ: सौराष्ट्र (गुजरात) के अत्यंत पवित्र और सुरम्य प्रदेश में जो ज्योतिर्मय रूप में विराजमान हैं, जिनके मस्तक पर बाल-चन्द्रमा मुकुट के समान सुशोभित है, और जो अपने भक्तों को अनन्य भक्ति प्रदान करने के लिए साक्षात् कृपापूर्वक अवतरित हुए हैं — उन देवाधिदेव भगवान श्री सोमनाथ की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

श्लोक २

श्रीशैलशृङ्गे विबुधातिसङ्गे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा वसन्तम्।

तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम्॥ २॥

भावार्थ: श्रीशैल पर्वत के उस पावन शिखर पर, जहाँ देवताओं और ऋषियों का निरंतर समागम रहता है, जो अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं और इस घोर संसार-सागर से पार उतारने के लिए सेतु (पुल) के समान हैं — उन अद्वितीय भगवान श्री मल्लिकार्जुन को मैं आदरपूर्वक प्रणाम करता हूँ।

श्लोक ३

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।

अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्॥ ३॥

भावार्थ: सज्जनों को मोक्ष प्रदान करने और अपने भक्तों की अकाल मृत्यु (असामयिक संकट) से रक्षा करने के लिए जिन्होंने पावन अवन्तिकापुरी (उज्जैन) में अवतार धारण किया है — उन सुरश्रेष्ठ, कालों के काल भगवान श्री महाकालेश्वर की मैं वंदना करता हूँ।

श्लोक ४

कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय।

सदैव मान्धातृपुरे वसन्तमोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे॥ ४॥

भावार्थ: नर्मदा और कावेरी (नर्मदा की पावन जलधारा) के पवित्र संगम पर, साधु-संतों और सज्जनों के उद्धार हेतु जो सदैव मान्धाता नगरी में निवास करते हैं — उन प्रणवरूप, देवाधिदेव भगवान श्री ओंकारेश्वर की मैं स्तुति करता हूँ।

श्लोक ५

पूर्वोत्तरे प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम्।

सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि॥ ५॥

भावार्थ: पूर्वोत्तर दिशा में चिताभूमि (अथवा प्रज्वलित तेज के पावन धाम) में जो माता पार्वती (गिरिजा) के साथ सदा विराजमान रहते हैं, और जिनके चरण-कमलों की देवता एवं असुर दोनों श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं — उन समस्त रोगों और कष्टों को हरने वाले भगवान श्री वैद्यनाथ को मैं नमन करता हूँ।

श्लोक ६

यं डाकिनीशाकिनिकासमाजैर्निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च।

सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि॥ ६॥

भावार्थ: डाकिनी-शाकिनी तथा समस्त गणों द्वारा जिनकी सेवा-उपासना की जाती है, जो भीमा नदी के तट पर 'भीमशंकर' नाम से प्रसिद्ध हैं और सदा अपने भक्तों के कल्याण में तत्पर रहते हैं — उन कल्याणकारी भगवान श्री भीमशंकर को मेरा सादर प्रणाम है।

श्लोक ७

सुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिखैरसंख्यैः।

श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि॥ ७॥

भावार्थ: ताम्रपर्णी नदी और विशाल समुद्र के पावन संगम पर, असंख्य बाणों व पत्थरों से विशाल सेतु बनाकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी ने जिनकी प्रतिष्ठा व पूजा की — उन पापनाशक भगवान श्री रामेश्वरम को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।

श्लोक ८

याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः।

सद्भक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये॥ ८॥

भावार्थ: दक्षिण दिशा में (अथवा दारुकावन के अत्यंत रमणीय प्रदेश में), जिनका श्रीअंग दिव्य नागों और आभूषणों से सुशोभित है, जो अपने शरणागत को उत्तम भक्ति और मोक्ष दोनों प्रदान करते हैं — उन एकमात्र परमेश्वर भगवान श्री नागेश्वर (नागनाथ) की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक ९

सानन्दमानन्दवने वसन्तमानन्दकन्दं हतपापवृन्दम्।

वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये॥ ९॥

भावार्थ: जो पावन आनंदवन (काशी) में परमानंद के साथ निवास करते हैं, जो समस्त आनंद के मूल कंद हैं, भक्तों के समस्त पाप-समूहों का नाश करने वाले हैं, और जो अनाथों के एकमात्र नाथ व वाराणसी के स्वामी हैं — उन देवाधिदेव भगवान श्री काशी विश्वनाथ की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

श्लोक १०

सह्याद्रिशीर्षे विमले वसन्तं गोदावरितीरपवित्रदेशे।

यद्दर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्बकमीशमीडे॥ १०॥

भावार्थ: सह्याद्रि पर्वत के निर्मल शिखर पर और पतित-पावनी गोदावरी (गौतमी) नदी के पावन तट पर जो निवास करते हैं, और जिनके मात्र दर्शन से घोर से घोर पाप भी तुरंत नष्ट हो जाते हैं — उन त्रिनेत्रधारी भगवान श्री त्र्यम्बकेश्वर की मैं स्तुति करता हूँ।

श्लोक ११

महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।

सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे॥ ११॥

भावार्थ: विशाल हिमालय (महाद्रि) की सुरम्य गोद में मंदाकिनी तट पर जो आनंदपूर्वक विहार करते हैं, और मुनीश्वरों, देवताओं, असुरों, यक्षों तथा गंधर्वों द्वारा जिनकी निरंतर पूजा की जाती है — उन अलौकिक भगवान श्री केदारनाथ की मैं आराधना करता हूँ।

श्लोक १२

इलापुरे रम्यविशालकेऽस्मिन् समुल्लसन्तं च जगद्वरेण्यम्।

वन्दे महोदारतरस्वभावं घृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये॥ १२॥

भावार्थ: अतिशय विशाल और सुरम्य इलापुर (वेरुळ/एलोरा) क्षेत्र में जो दिव्य ज्योति के रूप में शोभायमान हैं, जो संपूर्ण जगत के वंदनीय हैं और जिनका स्वभाव परम उदार व कृपालु है — उन भगवान श्री घृष्णेश्वर की मैं वंदना करता हूँ और उनकी शरण में जाता हूँ।

फलश्रुति

द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्मरणं सर्वकामप्रदं शुभम्।

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।

सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥ १३॥

भावार्थ: भगवान शिव के इन बारह ज्योतिर्लिंगों का स्मरण समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला और परम कल्याणकारी है। जो मनुष्य प्रातःकाल और सायंकाल इन बारह ज्योतिर्लिंगों का श्रद्धापूर्वक पाठ अथवा स्मरण करता है, उसके सात जन्मों के संचित पाप भी तुरंत नष्ट हो जाते हैं और वह अंत में शिवलोक को प्राप्त होता है।

श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का महत्व एवं परिचय

भारतीय सनातन परंपरा में भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों को आत्म-चेतना और मोक्ष का साक्षात् प्रकाश-पुंज माना गया है। ज्योतिर्लिंग का शाब्दिक अर्थ है — ‘ज्योति स्वरूप लिंग’ अर्थात् जहाँ महादेव स्वयं निराकार ब्रह्म से ज्योतिर्मय लिंग के रूप में साकार प्रकट हुए। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र (Dwadash Jyotirlinga Stotram) उन सभी बारह पावन धामों की दिव्य ऊर्जा और उनकी भौगोलिक व आध्यात्मिक स्थिति को एक अत्यंत मधुर छंद में पिरोता है।

यह स्तोत्र केवल कुछ श्लोकों का समूह नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष की आध्यात्मिक एकता का साक्षात् प्रतीक है। सौराष्ट्र के समुद्र तट पर स्थित सोमनाथ से लेकर दक्षिण के रामेश्वरम तक, और हिमालय के तुंग शिखरों पर विराजमान केदारनाथ से लेकर पूर्वोत्तर के वैद्यनाथ तक — यह स्तोत्र साधक को भारत के चारों कोनों में प्रतिष्ठित महादेव के बारह महारूपों की मानस-यात्रा करा देता है। जब एक भक्त इस स्तोत्र का उच्चारण करता है, तो उसे एक ही स्थान पर बैठे हुए साक्षात् संपूर्ण तीर्थाटन का पुण्य-फल प्राप्त होता है।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों का स्मरण प्रत्येक शिवभक्त के लिए असीम शांति, अभय और पाप-मुक्ति का मार्ग खोलता है। भौतिक जीवन की आपाधापी, मानसिक अशांति, असाध्य रोग, अकाल मृत्यु का भय और ग्रहों के अनिष्ट प्रभाव — इन सभी का शमन द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नित्य ध्यान से संभव माना गया है। जो भी साधक विशुद्ध हृदय से इस स्तोत्र की शरण लेता है, महादेव उसके समस्त संचित पापों को भस्म कर जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चतुर्विध फल प्रदान करते हैं।

श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र पाठ करने की सही विधि एवं नियम

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ अत्यंत सरल और शीघ्र फलदायी है। अधिकतम आध्यात्मिक लाभ हेतु निम्नलिखित शास्त्रीय विधि एवं नियमों का पालन करें:

  1. शुभ दिन एवं मुहूर्त: नित्य प्रातः अथवा संध्याकाल में यह पाठ किया जा सकता है। विशेष रूप से सोमवार, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, श्रावण मास (सावन) तथा महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर इसका पाठ सहस्त्र गुना फलदायी माना गया है।
  2. स्थान एवं शुद्धि: स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण करें। शांत व पवित्र पूजा स्थल पर उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  3. आसन एवं दीप-पूजन: कुशा अथवा ऊन के स्वच्छ आसन पर बैठें। भगवान शिव की प्रतिमा, शिवलिंग अथवा द्वादश ज्योतिर्लिंग चित्र के समक्ष शुद्ध गाय के घी का दीपक और सुगंधित धूप प्रज्वलित करें।
  4. पंचोपचार / षोडशोपचार पूजन: संभव हो तो शिवलिंग पर जल, गंगाजल, कच्चा दूध, श्वेत चंदन, भस्म, बिल्वपत्र और धतूरा अर्पित करें।
  5. पाठ की लय एवं भाव: स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक का उच्चारण अत्यंत शुद्ध, स्पष्ट और लयबद्ध भाव से करें। श्लोक पढ़ते समय संबंधित ज्योतिर्लिंग धाम का मन में ध्यान करते जाएं। पाठ के उपरांत भगवान शिव की आरती करें और ‘ॐ नमः शिवाय’ महामंत्र का जप करें।

श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक आध्यात्मिक व सांसारिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • सात जन्मों के पापों का क्षय: ‘सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति’ — स्तोत्र की फलश्रुति स्पष्ट घोषणा करती है कि नित्य प्रातः-सायं द्वादश ज्योतिर्लिंगों के स्मरण मात्र से साधक के सात जन्मों के ज्ञात-अज्ञात पाप तत्क्षण विनष्ट हो जाते हैं।
  • अकाल मृत्यु एवं घोर संकटों से अभय-दान: ‘अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्’ — महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्तुति साधक को दुर्घटना, असाध्य रोग और अकाल मृत्यु के भय से सर्वथा मुक्त कर दीर्घायु प्रदान करती है।
  • घर बैठे संपूर्ण तीर्थ-दर्शन का पुण्य: जो श्रद्धालु शारीरिक, आर्थिक या समय की सीमाओं के कारण सभी बारह ज्योतिर्लिंगों की प्रत्यक्ष यात्रा नहीं कर पाते, उन्हें इस स्तोत्र के नित्य पाठ से संपूर्ण द्वादश धामों के प्रत्यक्ष दर्शन का फल प्राप्त होता है।
  • रोग, शोक एवं व्याधियों से मुक्ति: ‘सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि’ — भगवान वैद्यनाथ के पावन श्लोक का जप शारीरिक कष्टों, असाध्य बीमारियों और मानसिक तनाव का निवारण कर उत्तम आरोग्य प्रदान करता है।
  • संसार-सागर से मुक्ति एवं मोक्ष-प्राप्ति: ‘तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेकं नमामि संसारसमुद्रसेतुम्’ — भगवान मल्लिकार्जुन की कृपा से साधक भवसागर के कष्टों को पार कर अंत में शिव के परम धाम (कैलास) को प्राप्त करता है।
  • ग्रह-दोष एवं कालसर्प दोष की शांति: द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नित्य स्मरण से कुंडली के अशुभ ग्रह, शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या तथा कालसर्प व पितृदोषों की प्रतिकूलता समाप्त होकर शुभता में परिवर्तित हो जाती है।

भगवान शिव के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

महादेव शिवशंभु की असीम अनुकंपा और कृपा प्राप्ति हेतु इन पवित्र पाठों का भी नित्य श्रवण व पाठ करें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ कब और कैसे करना चाहिए?

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल सूर्योदय के समय अथवा सायंकाल में भगवान शिव के सम्मुख करना सर्वोत्तम माना गया है। विशेषकर सोमवार, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि और महाशिवरात्रि के दिन पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके घी का दीपक जलाकर इसका पाठ करने से अनंत गुना फल मिलता है।

प्र.द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र के रचयिता कौन हैं और इसमें किन-किन ज्योतिर्लिंगों का वर्णन है?

यह पावन स्तोत्र सनातन धर्म के महान दार्शनिक जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित माना जाता है। इसमें सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वरम, नागेश्वर, काशी विश्वनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ और घृष्णेश्वर — इन सभी बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों के दिव्य स्वरूप व स्थानों की स्तुति की गई है।

प्र.क्या द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र के पाठ से सभी १२ ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का फल मिलता है?

हाँ, शास्त्रों और पुराणों की मान्यता के अनुसार जो भक्त श्रद्धाभाव से नित्य इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे घर बैठे ही साक्षात् द्वादश ज्योतिर्लिंगों की पावन तीर्थयात्रा और दर्शन के समान पुण्य प्राप्त होता है। स्तोत्र की फलश्रुति में कहा गया है — 'सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति' — अर्थात इसके नियमित स्मरण मात्र से मनुष्य के सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

प्र.क्या अकाल मृत्यु, भय और ग्रह-दोष के निवारण के लिए यह स्तोत्र फलदायी है?

निसंदेह, यह स्तोत्र संकट, भय और ग्रह-पीड़ा को दूर करने वाला है। तीसरे श्लोक में भगवान महाकाल की स्तुति करते हुए कहा गया है — 'अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहासुरेशम्' — अर्थात यह पाठ अकाल मृत्यु के भय से रक्षा करता है तथा शनि, राहु-केतु जैसे क्रूर ग्रहों के दोषों और नकारात्मक ऊर्जा का शमन करता है।

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