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विष्णु

विष्णु चालीसा— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Vishnu Chalisa

जगत के पालनहार और शेषशायी भगवान श्री विष्णु की यह चालीसा — नारायण-नाम के स्मरण से भक्त के समस्त कष्ट, पाप और भय का नाश होकर सुख-शांति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है।

परंपरागत६ मिनट पाठ

विष्णु चालीसा संपूर्ण पाठ

दोहा एवं ४० चौपाइयाँ सरल हिंदी भावार्थ सहित

प्रारंभिक दोहा

विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय।

कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय॥

अर्थ: हे भगवान विष्णु! अपने इस दीन सेवक की विनती को ध्यान से सुनिए और मुझे वह ज्ञान तथा शब्द-सामर्थ्य दीजिए, जिससे मैं आपकी अनंत कीर्ति का थोड़ा-सा भी गुणगान कर सकूं।

चौपाई

नमो विष्णु भगवान खरारी।

कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥

अर्थ: हे खर नामक दैत्य का नाश करने वाले भगवान विष्णु! आपको मेरा सादर नमन है; आप ही संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त रहकर अपने भक्तों के समस्त कष्टों का नाश करने वाले हैं।

प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी।

त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥

अर्थ: इस संसार में आपकी शक्ति अत्यंत प्रबल और अपार है; आपके तेज का प्रकाश स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल — तीनों लोकों में सदा फैला रहता है।

सुन्दर रूप मनोहर सूरत।

सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥

अर्थ: आपका स्वरूप अत्यंत सुंदर और नेत्रों को मोह लेने वाला है; आपका स्वभाव सरल व सहज है, और आपकी मूरत को देखकर हर किसी का मन स्वाभाविक ही मोहित हो जाता है।

तन पर पीताम्बर अति सोहत।

बैजन्ती माला मन मोहत॥

अर्थ: आपके श्री अंगों पर पीला रेशमी वस्त्र अत्यंत शोभायमान लगता है, और गले में पड़ी वैजयंती माला देखकर भक्त का मन सहज ही आपकी ओर खिंच जाता है।

शंख चक्र कर गदा बिराजे।

देखत दैत्य असुर दल भाजे॥

अर्थ: आपके हाथों में शंख, चक्र और गदा सदा शोभायमान रहते हैं; इन्हीं दिव्य आयुधों को देखते ही दैत्यों और असुरों की सेनाएं भयभीत होकर भाग जाती हैं।

सत्य धर्म मद लोभ न गाजे।

काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥

अर्थ: जहां आपका सत्य और धर्म प्रतिष्ठित रहता है, वहां अहंकार और लोभ को पांव टिकाने का स्थान नहीं मिलता; काम, क्रोध, मद और लोभ जैसे विकार भी आपकी शरण में टिक नहीं पाते।

संतभक्त सज्जन मनरंजन।

दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥

अर्थ: आप संतों, भक्तों और सज्जनों के मन को सदा आनंदित करने वाले हैं, और दूसरी ओर दुष्ट दानवों तथा असुरों की सेनाओं का मान-मर्दन करने वाले भी आप ही हैं।

सुख उपजाय कष्ट सब भंजन।

दोष मिटाय करत जन सज्जन॥

अर्थ: आप भक्तों के जीवन में सुख की उत्पत्ति करते हैं और उनके समस्त कष्टों का नाश कर देते हैं; उनके दोषों को मिटाकर एक सामान्य जीव को भी सज्जन व श्रेष्ठ बना देते हैं।

पाप काट भव सिंधु उतारण।

कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥

अर्थ: आप भक्त के समस्त पापों को काटकर उसे इस संसार-सागर से पार उतार देते हैं; उसके कष्टों का नाश करके उसे भवबंधन से सदा के लिए उबार लेते हैं।

करत अनेक रूप प्रभु धारण।

केवल आप भक्ति के कारण॥

अर्थ: हे प्रभु! आप समय-समय पर अनेक रूप और अवतार धारण करते हैं, और इसका एकमात्र कारण है आपकी अपने भक्तों के प्रति अनंत करुणा और उनकी भक्ति की रक्षा करने की इच्छा।

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा।

तब तुम रूप राम का धारा॥

अर्थ: जब धरती माता गौ का रूप धारण करके आपसे अपनी रक्षा की पुकार करने आईं, तब आपने ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का रूप धारण कर उनकी वेदना को दूर किया।

भार उतार असुर दल मारा।

रावण आदिक को संहारा॥

अर्थ: श्रीराम के रूप में आपने धरती का भार उतारकर अधर्मी असुरों की सेनाओं का संहार किया, और रावण जैसे महाबली अहंकारी दुष्टों का भी नाश किया।

आप वराह रूप बनाया।

हरण्याक्ष को मार गिराया॥

अर्थ: पृथ्वी की रक्षा के लिए आपने ही वराह (शूकर) का विशाल रूप धारण किया और अहंकारी दैत्य हिरण्याक्ष को मारकर उसका अंत किया।

धर मत्स्य तन सिंधु बनाया।

चौदह रतनन को निकलाया॥

अर्थ: आपने मत्स्य (मीन) का रूप धारण कर समुद्र में अपने भक्तों की रक्षा की, और समुद्र-मंथन के समय चौदह अमूल्य रत्नों को प्रकट होने में सहायक बने।

अमिलख असुरन द्वंद मचाया।

रूप मोहनी आप दिखाया॥

अर्थ: समुद्र-मंथन से निकले अमृत के लिए जब लोभी असुरों में आपस में भयंकर कलह मच गया, तब आपने मोहिनी का अलौकिक सुंदर रूप धारण कर उन्हें मोहित कर लिया।

देवन को अमृत पान कराया।

असुरन को छवि से बहलाया॥

अर्थ: मोहिनी रूप में आपने अपनी चतुराई से देवताओं को अमृत का पान कराया, और असुरों को अपनी मोहक छवि में उलझाकर उन्हें अमृत से वंचित रखा।

कूर्म रूप धर सिंधु मझाया।

मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥

अर्थ: समुद्र-मंथन के समय आपने कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर स्वयं को समुद्र के बीच स्थिर किया, और मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर तुरंत थाम लिया।

शंकर का तुम फन्द छुड़ाया।

भस्मासुर को रूप दिखाया॥

अर्थ: जब भस्मासुर के वरदान से भगवान शंकर स्वयं संकट में फंस गए, तब आपने ही मोहिनी रूप दिखाकर उस दुष्ट असुर को भस्मासुर के ही बंधन से शिवजी को मुक्त कराया।

वेदन को जब असुर डुबाया।

कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया॥

अर्थ: जब किसी असुर ने वेदों को चुराकर समुद्र में डुबा दिया, तब आपने ही उपाय करके उन पवित्र वेदों को खोजकर पुनः संसार को लौटाया।

मोहित बनकर खलहि नचाया।

उसही कर से भस्म कराया॥

अर्थ: अपने अलौकिक मोहिनी स्वरूप से आपने दुष्ट भस्मासुर को ही नचाते हुए उसके हाथ उसके अपने सिर पर रखवा दिए, और उसी के हाथों उसे भस्म करा दिया।

असुर जलंधर अति बलदाई।

शंकर से उन कीन्ह लड़ाई॥

अर्थ: जलंधर नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था, जिसने अपने अहंकार में स्वयं भगवान शंकर से भी भयंकर युद्ध ठान लिया।

हार पार शिव सकल बनाई।

कीन सती से छल खल जाई॥

अर्थ: जब शिवजी के समस्त प्रयास भी जलंधर की पतिव्रता पत्नी वृंदा के सतीत्व-बल के आगे असफल होने लगे, तब उस दुष्ट असुर को परास्त करने हेतु उसकी पवित्र पत्नी के साथ छल करना आवश्यक हो गया।

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी।

बतलाई सब विपत कहानी॥

अर्थ: तब भगवान शंकर की अर्धांगिनी माता पार्वती ने आपका स्मरण किया और समस्त विपत्ति की कहानी कहकर आपसे सहायता की प्रार्थना की।

तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी।

वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥

अर्थ: माता पार्वती की प्रार्थना सुनकर आपने ही एक ज्ञानी मुनीश्वर का रूप धारण किया, जिससे वृंदा का ध्यान अपने पति जलंधर से हट गया।

देखत तीन दनुज शैतानी।

वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥

अर्थ: आपकी इस लीला की चतुराई न समझ पाने के कारण वृंदा ने आपको ही अपना पति जलंधर मानकर आकर आपका आलिंगन कर लिया।

हो स्पर्श धर्म क्षति मानी।

हना असुर उर शिव शैतानी॥

अर्थ: ज्यों ही वृंदा का पतिव्रता-धर्म इस प्रकार खंडित हुआ, उसी क्षण भगवान शंकर ने अवसर पाकर उस दुष्ट शैतान असुर जलंधर का हृदय बेध कर उसका अंत कर दिया।

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे।

हिरणाकुश आदिक खल मारे॥

अर्थ: आपने ही बालक ध्रुव और भक्त प्रह्लाद जैसे अपने शरणागतों की रक्षा की, और हिरण्यकशिपु जैसे अहंकारी दुष्टों का नाश करके अपने भक्तों को अभय प्रदान किया।

गणिका और अजामिल तारे।

बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥

अर्थ: आपने अंत समय में केवल 'नारायण' नाम पुकारने से ही अजामिल जैसे पापी ब्राह्मण तथा एक सामान्य गणिका को भी तार दिया; ऐसे अनगिनत भक्तों को आपने भवसागर से पार उतारा है।

हरहु सकल संताप हमारे।

कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥

अर्थ: हे सृष्टि के रचयिता श्रीहरि! आप हमारे समस्त दुखों और संतापों का नाश कर दीजिए, और अपने इस सेवक पर अपनी अहैतुकी कृपा-दृष्टि बनाए रखिए।

देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे।

दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥

अर्थ: हे दीनों के सच्चे बंधु और भक्तों के कल्याणकारी प्रभु! मेरी यही इच्छा है कि मैं अपनी इन्हीं नेत्रों से आपके साक्षात दिव्य दर्शन कर सकूं।

चहत आपका सेवक दर्शन।

करहु दया अपनी मधुसूदन॥

अर्थ: हे मधुसूदन! आपका यह दीन सेवक सदा आपके दर्शन की ही कामना करता है; कृपा करके अपनी असीम दया-दृष्टि इस पर बनाए रखिए।

जानूं नहीं योग्य जप पूजन।

होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥

अर्थ: हे प्रभु! मुझे न तो आपके योग्य जप-पूजन की विधि का ज्ञान है, न ही यज्ञ और स्तुति करने की उचित रीति का; फिर भी आप मेरी इस भावमात्र प्रार्थना को स्वीकार कर लीजिए।

शीलदया सन्तोष सुलक्षण।

विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥

अर्थ: मुझमें न तो शील, दया और संतोष जैसे शुभ लक्षण हैं, और न ही मुझे किसी विशेष व्रत या साधना की गूढ़ विधि का ज्ञान है; मैं तो केवल आपकी शरण में हूं।

करहुं आपका किस विधि पूजन।

कुमति विलोक होत दुख भीषण॥

अर्थ: मैं अपनी समझ से यह निश्चय नहीं कर पाता कि आपकी पूजा किस विधि से करूं; अपनी इस कुमति (अल्प बुद्धि) को देखकर मुझे अत्यंत गहरी पीड़ा होती है।

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण।

कौन भांति मैं करहु समर्पण॥

अर्थ: मैं आपको प्रणाम किस विधि से करूं, आपका स्मरण कैसे करूं, और अपने आपको आपके चरणों में किस प्रकार पूर्णतः समर्पित करूं — यह भी मुझे ज्ञात नहीं है।

सुर मुनि करत सदा सेवकाई।

हर्षित रहत परम गति पाई॥

अर्थ: देवता और महान मुनिगण भी सदा आपकी सेवा में तत्पर रहते हैं, और आपकी शरण में परम गति (मोक्ष) को प्राप्त कर सदा आनंदित रहते हैं।

दीन दुखिन पर सदा सहाई।

निज जन जान लेव अपनाई॥

अर्थ: आप सदा ही दीन-दुखियों के सच्चे सहायक रहे हैं; हे प्रभु! मुझ दीन सेवक को भी अपना निज जन मानकर अपनी शरण में अपना लीजिए।

पाप दोष संताप नशाओ।

भव-बंधन से मुक्त कराओ॥

अर्थ: हे करुणानिधान! मेरे समस्त पाप, दोष और संतापों का नाश कीजिए, और मुझे इस संसार के भवबंधन से सदा के लिए मुक्त कर दीजिए।

सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ।

निज चरनन का दास बनाओ॥

अर्थ: मुझे सच्चा सुख और सात्विक संपत्ति प्रदान कीजिए, और इससे भी बढ़कर — मुझे अपने पावन चरणों का अनन्य दास बना लीजिए; यही मेरी सबसे बड़ी कामना है।

निगम सदा ये विनय सुनावै।

पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥

अर्थ: वेद-शास्त्र (निगम) भी सदा यही विनय-वाणी सुनाते हैं; जो भी साधक श्रद्धापूर्वक इस विष्णु चालीसा का पाठ करता या सुनता है, वह निश्चित ही सुख और शांति को प्राप्त करता है।

श्री विष्णु चालीसा का महत्व एवं परिचय

जब भी सृष्टि में अधर्म अपना सिर उठाता है और भक्त संकट में पुकार लगाता है, तब जगत के पालनहार भगवान श्री विष्णु किसी-न-किसी रूप में अवतरित होकर संतुलन स्थापित करते हैं। शेषनाग की शय्या पर क्षीरसागर में विराजमान, शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी यह स्वरूप केवल ऐश्वर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि इस भरोसे का प्रतीक है कि सृष्टि कभी भी अनाथ नहीं छोड़ी जाएगी।

विष्णु चालीसा इसी भरोसे का पाठ है। यह कोई एक कथा नहीं, बल्कि मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, मोहिनी और राम जैसे अनेक अवतारों की लीलाओं की संक्षिप्त माला है — हर एक अवतार इस बात का प्रमाण कि प्रभु अपने भक्तों की रक्षा के लिए कोई भी रूप धारण करने में संकोच नहीं करते। ध्रुव, प्रह्लाद, अजामिल और एक सामान्य गणिका तक के उद्धार की चर्चा करके यह चालीसा स्पष्ट कर देती है कि भगवान विष्णु की शरण में जाति, कर्म या अतीत के पाप कोई बाधा नहीं हैं।

जो साधक श्रद्धापूर्वक इस पाठ को अपनाता है, उसके भीतर यह निश्चय दृढ़ होता है कि संसार-सागर कितना भी गहरा क्यों न हो, नारायण का एक स्मरण उसे पार लगा सकता है।

श्री विष्णु चालीसा पाठ करने की सही विधि एवं नियम

भगवान विष्णु की पूजा में पवित्रता, तुलसी और सात्विकता का विशेष महत्व है:

  1. दिन एवं समय: गुरुवार तथा एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात अथवा संध्याकाल में पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है।
  2. वस्त्र एवं दिशा: स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।
  3. पूजन सामग्री: भगवान को पीला चंदन, पीले फूल अथवा कमल और पंचामृत अर्पित करें; तुलसी दल का होना अनिवार्य मानें, क्योंकि तुलसी के बिना विष्णु-पूजन अधूरा माना जाता है।
  4. दीप एवं भोग: गाय के घी का दीपक जलाएं और भोग में केला अथवा ऋतुफल अर्पित करें।
  5. पाठ: शांत व एकाग्र मन से प्रारंभिक दोहा और चालीस चौपाइयों का पाठ करें; शंख बजाकर पाठ का समापन करना शुभ माना जाता है।

श्री विष्णु चालीसा पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

विष्णु चालीसा के श्रद्धापूर्वक पाठ से साधक को निम्नलिखित विशिष्ट लाभ प्राप्त होते हैं:

  • कष्टों और भय का नाश: “कष्ट नशावन अखिल बिहारी” — जीवन के संकट और मानसिक अशांति दूर होती है।
  • नकारात्मक शक्तियों से रक्षा: “देखत दैत्य असुर दल भाजे” — भय और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा मिलती है।
  • भूतकाल के पापों से भी मुक्ति की आशा: “गणिका और अजामिल तारे” — यह पाठ बताता है कि सच्चे पश्चाताप और भक्ति से कोई भी व्यक्ति उद्धार पा सकता है।
  • विकारों पर नियंत्रण: “काम क्रोध मद लोभ न छाजे” — नियमित पाठ से मन के विकार शांत होते हैं।
  • भवबंधन से मुक्ति: “भव-बंधन से मुक्त कराओ” — अंततः साधक को मोक्ष की ओर अग्रसर करता है।

विष्णु जी के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

जगत के पालनहार भगवान श्री विष्णु की पूर्ण कृपा प्राप्ति हेतु इन पवित्र पाठों का भी नित्य पाठ करें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.श्री विष्णु चालीसा का पाठ किस दिन और किस विधि से करना चाहिए?

भगवान विष्णु की उपासना के लिए गुरुवार और एकादशी का दिन विशेष शुभ माना जाता है। प्रातःकाल स्नान कर पीले वस्त्र धारण करें, पूजा में तुलसी दल, पीले फूल और पीला चंदन अर्पित करें, घी का दीपक जलाकर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके पाठ करें।

प्र.विष्णु चालीसा के नियमित पाठ से क्या लाभ प्राप्त होते हैं?

जैसा चालीसा में ही कहा गया है — 'पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै' — इसके नित्य पाठ से मन की अशांति और भय दूर होता है, जीवन के कष्ट कम होते हैं और भगवान विष्णु की कृपा से सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

प्र.विष्णु चालीसा किसने रची थी और यह किस परंपरा का पाठ है?

अन्य कई लोक-प्रचलित चालीसाओं की तरह विष्णु चालीसा के रचयिता का नाम ग्रंथों में प्रमाणित रूप से उपलब्ध नहीं है; यह मौखिक भक्ति-परंपरा से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता आया एक परंपरागत पाठ है, जिसमें भगवान विष्णु के दशावतारों की लीलाओं का वर्णन है।

प्र.क्या विष्णु चालीसा का पाठ कोई भी व्यक्ति कर सकता है?

हाँ, इस चालीसा की चौपाई 'गणिका और अजामिल तारे, बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे' स्वयं यह दर्शाती है कि भगवान विष्णु की भक्ति में कोई भेदभाव नहीं है — स्त्री-पुरुष, छोटे-बड़े सभी श्रद्धा और शुद्ध भाव से इसका पाठ कर सकते हैं।

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