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शीतला चालीसा (Sheetla Chalisa — दोहा एवं ४० चौपाइयाँ सरल हिंदी भावार्थ सहित)
शीतला चालीसा— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित
Sheetla Chalisa
चेचक, ज्वर, समस्त दाह-रोगों का शमन करने वाली एवं संतानों की आरोग्य-रक्षा करने वाली भगवती माँ शीतला की यह पावन चालीसा — श्रद्धापूर्वक पाठ करने से तन-मन शीतल होकर समस्त पीड़ाओं का नाश होता है।
शीतला चालीसा संपूर्ण पाठ
दोहा एवं ४० चौपाइयाँ सरल हिंदी भावार्थ सहित
जय-जय माता शीतला, तुमहिं धरै जो ध्यान।
होय विमल शीतल हृदय, विकसै बुद्धि बलज्ञान॥
अर्थ: हे भगवती माँ शीतला! आपकी सदा जय-जयकार हो; जो भी भक्त आपका ध्यान धरता है, उसका अंतःकरण निर्मल व शीतल हो जाता है तथा उसकी बुद्धि, आत्मबल और दिव्य ज्ञान का विकास होता है।
जय-जय-जय शीतला भवानी।
जय जग जननि सकल गुणखानी॥
अर्थ: हे भगवती माँ शीतला भवानी! आपकी सदा जय हो, जय हो, जय हो; आप संपूर्ण चराचर जगत की माता और समस्त दिव्य गुणों व शक्तियों की परम भंडार हैं।
गृह-गृह शक्ति तुम्हारी राजित।
पूरण शरदचन्द्र समसाजित॥
अर्थ: घर-घर में आपकी मंगलमयी शक्ति प्रतिष्ठित और सुशोभित है; आपका रूप शरद पूर्णिमा के पूर्ण चंद्रमा के समान अत्यंत शीतल, उज्ज्वल और शोभायमान है।
विस्फोटक से जलत शरीरा।
शीतल करत हरत सब पीरा॥
अर्थ: चेचक, खसरा, फुंसियों व दाह-ज्वर की भयंकर अग्नि से जब मनुष्य का शरीर तपने लगता है, तब आपकी कृपा दृष्टि उसे शीतल बनाकर समस्त असह्य पीड़ाओं को हर लेती है।
मातु शीतला तव शुभनामा।
सबके गाढ़े आवहिं कामा॥
अर्थ: हे माँ शीतला! आपका यह पावन नाम परम मंगलकारी है, जो विपत्ति और विकट संकट के समय अपने सभी भक्तों की सहायता के लिए तत्पर रहता है।
शोकहरी शंकरी भवानी।
बाल-प्राणरक्षी सुख दानी॥
अर्थ: आप भक्तों के समस्त शोकों को हरने वाली भगवान शिव की अर्धांगिनी शंकरी भवानी हैं, जो छोटे बालकों के प्राणों और स्वास्थ्य की रक्षा कर परिवारों को सुख प्रदान करती हैं।
शुचि मार्जनी कलश करराजै।
मस्तक तेज सूर्य समराजै॥
अर्थ: आपके कर-कमलों में पवित्र झाड़ू (मार्जनी) और शीतल जल से भरा पावन कलश सुशोभित है, तथा आपके मस्तक का अलौकिक तेज मध्याह्न के सूर्य के समान दैदीप्यमान है।
चौसठ योगिन संग में गावैं।
वीणा ताल मृदंग बजावैं॥
अर्थ: चौंसठ योगिनियां आपके साथ मिलकर आपका गुणगान करती हैं और वीणा, ताल, झांझ तथा मृदंग आदि मधुर वाद्य बजाकर आपकी स्तुति करती हैं।
नृत्य नाथ भैरो दिखरावैं।
सहस शेष शिव पार न पावैं॥
अर्थ: आपके सम्मुख भगवान भैरवनाथ आनंदमग्न होकर नृत्य करते हैं; सहस्त्रमुख वाले शेषनाग और स्वयं देवाधिदेव शिव भी आपकी अपार महिमा का अंत नहीं पा सकते।
धन्य-धन्य धात्री महारानी।
सुरनर मुनि सब सुयश बखानी॥
अर्थ: हे जगत का पालन-पोषण करने वाली धात्री महारानी! आप धन्य हैं, धन्य हैं; देवता, मानव और ऋषि-मुनि सभी एक स्वर से आपके पावन यश का गान करते हैं।
ज्वाला रूप महा बलकारी।
दैत्य एक विस्फोटक भारी॥
अर्थ: अतीत में दहकती ज्वाला के समान अत्यंत बलवान 'विस्फोटक' (चेचक/ज्वर) नाम का एक महाभयंकर दैत्य उत्पन्न हुआ था।
घर-घर प्रविशत कोई न रक्षत।
रोग रूप धरि बालक भक्षत॥
अर्थ: वह महामारी और भयंकर रोग का रूप धरकर घर-घर में प्रवेश करने लगा; कोई उसकी रोकथाम न कर सका और वह छोटे-छोटे बालकों को अपना ग्रास बनाने लगा।
हाहाकार मच्यो जगभारी।
सक्यो न कोई संकट टारी॥
अर्थ: उस भयानक प्रकोप से संपूर्ण संसार में त्राहि-त्राहि और हाहाकार मच गया; कोई भी देव या मनुष्य उस असह्य संकट को टालने में समर्थ न हो सका।
तब मैया धरि अद्भुत रूपा।
कर में लिये मार्जनी सूपा॥
अर्थ: तब भक्तों के रुदन को सुनकर हे दयामयी माँ! आपने एक अत्यंत अद्भुत और संहारक रूप धारण किया और अपने हाथों में पवित्र मार्जनी व सूप ग्रहण किया।
विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्ह्यो।
मूसल प्रहार बहुविधि कीन्ह्यो॥
अर्थ: आपने उस दुष्ट विस्फोटक दैत्य को बलपूर्वक पकड़ लिया और मूसल के तीक्ष्ण प्रहारों से उसे भली-भांति दंडित किया।
बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा।
मैया नहीं भल मैं कछु चीन्हा॥
अर्थ: माँ के प्रचंड तेज से भयभीत होकर उस दैत्य ने अनेक प्रकार से क्षमा-प्रार्थना की और कहा कि हे माँ! अज्ञानतावश मैं आपके परम प्रभाव को पहचान न सका।
अब नहिं मातु काहु गृह जइहौं।
जहँ अपवित्र तहां दुःख परिहौं॥
अर्थ: उसने प्रतिज्ञा की कि हे माता! अब मैं किसी के घर में अनिष्ट करने नहीं जाऊंगा, और जहां आपकी पूजा व पवित्रता होगी, वहां कोई दुःख नहीं ठहरने दूंगा।
पूजन पाठ मातु जब करिहै।
भय आनंद सकल दुःख हरिहै॥
अर्थ: जो भी भक्त विधि-विधान से आपका पूजन और पाठ करेगा, उसके घर में परमानंद की वर्षा होगी और उसके समस्त रोग-शोक दूर हो जाएंगे।
भभकत तन शीतल ह्वै जइहैं।
विस्फोटक भय घोर नसइहैं॥
अर्थ: ज्वर और दाह से जलता हुआ शरीर आपकी कृपा से पूर्णतः शीतल व स्वस्थ हो जाएगा और चेचक आदि का घोर भय सदा के लिए नष्ट हो जाएगा।
श्री शीतलहिं भजे कल्याना।
वचन सत्य भाषे भगवाना॥
अर्थ: भगवती शीतला का भजन और स्मरण करने से ही जीव का परम कल्याण संभव है — यह बात स्वयं भगवान शिव ने सत्य रूप में कही है।
विस्फोटक भय जिहि गृह भाई।
भजै देवि कहँ यही उपाई॥
अर्थ: हे भाइयो! जिस किसी के घर में भी ऐसे दाह-रोग या महामारी का भय उत्पन्न हो, उसके निवारण का एकमात्र उपाय देवी शीतला का अनन्य भाव से भजन करना है।
कलश शीतला का सजवावै।
द्विज से विधिवत पाठ करावै॥
अर्थ: घर में माँ शीतला के निमित्त पावन शीतल जल का कलश स्थापित करे और योग्य ब्राह्मण से इस चालीसा व स्तोत्र का विधिवत पाठ कराए।
तुम्हीं शीतला जग की माता।
तुम्हीं पिता जग के सुखदाता॥
अर्थ: हे माँ! आप ही संपूर्ण जगत की माता हैं और आप ही पिता स्वरूप होकर अपने बालकों का पालन व उन्हें समस्त सुख प्रदान करने वाली हैं।
तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी।
नमो नमामि शीतले देवी॥
अर्थ: आप ही संपूर्ण विश्व को धारण करने वाली जगद्धात्री और सुखों का विस्तार करने वाली हैं; हे भगवती शीतला देवी! मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।
नमो सुक्खकरणी दुःखहरणी।
नमो-नमो जगतारणि तरणी॥
अर्थ: समस्त सुखों को प्रदान करने वाली और दुःखों का हरण करने वाली हे माँ! आपको नमन है; इस भवसागर से जीवों को पार उतारने वाली मोक्षदायिनी नौका स्वरूप माँ! आपको बारंबार नमन है।
नमो-नमो त्रैलोक्य वन्दिनी।
दुखदारिद्रादिक निकन्दिनी॥
अर्थ: तीनों लोकों द्वारा पूजित और वंदित हे देवी! आपको नमस्कार है; दरिद्रता, दुर्भाग्य और क्लेशों की जड़ को समूल उखाड़ फेंकने वाली माँ! आपको प्रणाम है।
श्री शीतला शेढ़ला महला।
रुणली-झुणली मातु मंगला॥
अर्थ: लोक-परंपरा में आप शीतला, सेढल माता और महला आदि विविध पावन नामों से विख्यात हैं; रुनझुन पग-ध्वनि वाली हे माँ! आप सर्वमंगल करने वाली हैं।
हो तुम दिगंबर तनुधारी।
शोभित पंचनाम असवारी॥
अर्थ: समस्त दिशाओं को वस्त्र मानकर धारण करने वाली हे निष्काम माता! आप अपने पाँच पावन नामों और दिव्य सवारी के साथ सुशोभित होती हैं।
रासभ खर वैशाख सुनंदन।
गर्दभ दुर्वाकंद निकंदन॥
अर्थ: रासभ, खर, वैशाखनंदन और गर्दभ आदि नामों से पुकारा जाने वाला आपका पावन वाहन धैर्य और सहनशीलता का प्रतीक है, जो दूर्वा आदि तृणों से तृप्त रहता है।
सुमिरत संग शीतला माई।
जाहिं सकल दुःख दूर पराई॥
अर्थ: अपने वाहन सहित माँ शीतला के पावन स्वरूप का जो भी साधक स्मरण करता है, उसके जीवन के समस्त ताप और संताप तत्काल दूर भाग जाते हैं।
गलका गलगंडादि जु होई।
ताकर मंत्र न औषधि कोई॥
अर्थ: गलगंड (घेंघा), कंठ-रोग, फुंसियां अथवा शरीर में जो भी जलन युक्त व्याधियां होती हैं, जिनका कोई निश्चित मंत्र या दवा असर न करे—
एक मातु जी का आराधन।
और नहिं कोई है साधन॥
अर्थ: उन समस्त असाध्य रोगों की एकमात्र अचूक औषधि केवल और केवल माँ शीतला की शरण में जाना और उनकी श्रद्धापूर्वक आराधना करना ही है।
निश्चय मातु शरण जो आवै।
निर्भय मन इच्छित फल पावै॥
अर्थ: जो भी भक्त दृढ़ विश्वास के साथ आपकी शरण ग्रहण करता है, वह समस्त भय से मुक्त होकर अपनी मनोवांछित कामनाओं की सिद्धि पाता है।
कोढ़ी निर्मल काया धारै।
अंधा दृग निज दृष्टि निहारै॥
अर्थ: आपकी कृपा से कुष्ठ रोगी का शरीर निर्मल व कांतियुक्त हो जाता है, और नेत्रहीन व्यक्ति को दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है।
वन्ध्या नारि पुत्र को पावै।
जन्म दरिद्र धनी होई जावै॥
अर्थ: संतानहीन स्त्री को गुणवान पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है, और जन्म का दरिद्र व अभावग्रस्त व्यक्ति भी माँ के अनुग्रह से धन-धान्य से संपन्न हो जाता है।
मातु शीतला के गुण गावत।
लखा मूक को छंद बनावत॥
अर्थ: माँ शीतला के पावन गुणों का गान करने के प्रभाव से जन्मजात मूक (गूंगा) व्यक्ति भी अद्भुत काव्य और छंद रचने में समर्थ हो जाता है।
यामे कोई करै जनि शंका।
जग में मैया का ही डंका॥
अर्थ: माँ की इस अमोघ कृपा में किसी को लेशमात्र भी संदेह नहीं करना चाहिए; इस संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल भगवती शीतला की शक्ति का ही डंका बजता है।
भनत रामसुंदर प्रभुदासा।
तट प्रयाग से पूरब पासा॥
अर्थ: माँ के अनन्य सेवक भक्त रामसुंदर जी कहते हैं — तीर्थराज प्रयाग के गंगा तट से पूर्व दिशा की ओर—
पुरी तिवारी मोर निवासा।
ककरा गंगा तट दुर्वासा॥
अर्थ: ककरा ग्राम के समीप दुर्वासा ऋषि की तपोभूमि गंगा तट पर स्थित तिवारीपुर ग्राम मेरा पावन निवास स्थान है।
अब विलंब मैं तोहि पुकारत।
मातु कृपा की बाट निहारत॥
अर्थ: हे माँ! अब और विलंब न कीजिए, मैं आर्त भाव से आपको पुकार रहा हूँ और आपकी वात्सल्यमयी कृपा दृष्टि की बाट जोह रहा हूँ।
पड़ा द्वार तव आस लगाई।
रक्षा करहु शीतला माई॥
अर्थ: मैं आपकी ही पावन चौखट पर संपूर्ण आस लगाकर पड़ा हूँ; हे माँ शीतला! अपनी इस संतान की हर संकट से रक्षा कीजिए।
घट-घट वासी शीतला, शीतल प्रभा तुम्हार।
शीतल छइयां में झुलई, मइया पलना डार॥
अर्थ: हे घट-घट में वास करने वाली माँ शीतला! आपका दिव्य प्रभाव अत्यंत सुखद और शीतल है; अपनी ममतामयी शीतल छाया का पालना डालकर आप सदा अपने भक्तों और बालकों की रक्षा करती हैं।
यह चालीसा शीतला, पाठ करे जो कोय।
सपनेहुं दुःख व्यापै नहीं, नित सब मंगल होय॥
अर्थ: जो भी साधक इस श्री शीतला चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, उसे स्वप्न में भी कभी कोई दुःख या व्याधि स्पर्श नहीं करती और उसके जीवन में नित्य सर्वमंगल ही मंगल होता है।
श्री शीतला चालीसा का महत्व एवं परिचय
सनातन धर्म की पावन शक्ति परंपरा में माँ शीतला आरोग्य, शीतलता, स्वच्छता और संक्रामक व्याधियों से रक्षा करने वाली साक्षात करुणामयी देवी हैं। ग्रीष्म ऋतु के आगमन और ऋतु-परिवर्तन के समय जब प्रकृति में उष्णता (गर्मी) का प्रकोप बढ़ता है और मानव शरीर चेचक (माता), खसरा, छोटी माता, पित्त-ज्वर तथा रक्त-विकारों से तपने लगता है — तब उस संताप को शांत करने के लिए भगवती शीतला की अमृतमयी कृपा का ही आह्वान किया जाता है।
माँ शीतला का स्वरूप अत्यंत प्रतीकात्मक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी गहन संदेश देने वाला है। वे गर्दभ (रासभ) पर विराजमान हैं, जो धैर्य, शीतलता और सहनशीलता का प्रतीक है। उनके एक हाथ में ‘मार्जनी’ (झाड़ू) है, जो बाह्य और आंतरिक शुचिता (स्वच्छता) का संकेत करती है; दूसरे हाथ में ‘सूप’ (सूपड़ा) है, जो सारहीन विकारों को उड़ाकर शुद्ध तत्वों को ग्रहण करने की प्रेरणा देता है; तीसरे हाथ में औषधीय ‘नीम के पत्ते’ हैं जो जीवाणुनाशक हैं; और चौथे हाथ में ‘शीतल कलश’ है जो अमृत जल से दाह को शांत करता है।
श्री शीतला चालीसा भक्त कवि रामसुंदर जी द्वारा विरचित एक ऐसा पावन स्तोत्र है, जो माँ शीतला के अद्भुत पराक्रम, विस्फोटक दैत्य के दमन, बाल-रक्षा और असाध्य व्याधियों के शमन का रसमय वर्णन करता है। इसका नित्य अथवा शीतला अष्टमी के दिन पाठ करने से साधक के घर में सुख-शांति, आरोग्य और सात्विक शीतलता का वास होता है।
श्री शीतला चालीसा पाठ करने की सही विधि एवं नियम
माँ शीतला की पूजा में उष्णता (अग्नि) का त्याग और शीतलता की प्रधानता मुख्य नियम है। पाठ करते समय निम्नलिखित विधि का पालन करें:
- उत्तम तिथि एवं समय: चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतला अष्टमी / बासोड़ा), वैशाख व ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी-अष्टमी, अथवा किसी भी मंगलवार या शुक्रवार को प्रातःकाल स्नानादि कर पाठ करें।
- बासोड़ा का नियम: पूजा के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाना चाहिए। एक दिन पूर्व (सप्तमी) की शाम को शुद्ध घी में बने पकवान (पूड़ी, मीठे चावल, राबड़ी, गुलगुले) तैयार करके रख लें और अगले दिन उसी शीतल (बासी) भोजन का माँ को भोग लगाएं।
- शीतल कलश एवं नीम दल: पूजा स्थल पर तांबे अथवा मिट्टी के कलश में शीतल जल भरकर रखें। उसमें थोड़ा कच्चा दूध, गंगाजल और ताजे नीम के पत्ते डालें।
- पूजन सामग्री: माँ शीतला को रोली, हल्दी, अक्षत, मेहंदी, शीतल जल और सफेद पुष्प अर्पित करें। ध्यान रहे कि माँ शीतला को तपा हुआ या अत्यंत गर्म दीपक बहुत निकट नहीं रखा जाता; केवल आरती के समय भाव से दीप दिखाएं या शीतल नैवेद्य अर्पित करें।
- एकाग्र पाठ: शुद्ध चित्त होकर कुशा या सूती आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। दोहा, 40 चौपाइयों और समापन दोहों का शांत व स्पष्ट वाणी में पाठ करें।
- आरोग्य जल का छिड़काव: पाठ संपन्न होने पर कलश के शीतल जल से स्वयं आचमन करें, अपने बच्चों के मस्तक पर जल छिड़कें और पूरे घर में नीम की टहनी से उस जल का छिड़काव करें।
श्री शीतला चालीसा पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व
श्री शीतला चालीसा का नियमपूर्वक श्रद्धा से पाठ करने पर साधक को जीवन में निम्नलिखित प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होते हैं:
- चेचक, खसरा और दाह-रोगों से मुक्ति: “विस्फोटक से जलत शरीरा, शीतल करत हरत सब पीरा” — यदि परिवार में किसी को चेचक, छोटी माता, फोड़े-फुंसियां या तीव्र ज्वर की पीड़ा हो, तो यह पाठ शरीर के दाह को शांत कर शीघ्र आरोग्य दिलाता है।
- बालकों की दीर्घायु और रक्षा कवच: “शोकहरी शंकरी भवानी, बाल-प्राणरक्षी सुख दानी” — छोटे बच्चों को संक्रामक रोगों, नजर दोष और अकाल व्याधियों से बचाने के लिए माँ शीतला का यह पाठ अचूक रक्षा-कवच का कार्य करता है।
- संतान प्राप्ति और वंश वृद्धि: “वन्ध्या नारि पुत्र को पावै, जन्म दरिद्र धनी होई जावै” — संतानहीन महिलाओं द्वारा शीतला अष्टमी का व्रत रखकर इस चालीसा का पाठ करने से सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है।
- असाध्य नेत्र और त्वचा रोगों में लाभ: “कोढ़ी निर्मल काया धारै, अंधा दृग निज दृष्टि निहारै” — माँ की कृपा से त्वचा संबंधी रोग दूर होते हैं और नेत्र-ज्योति में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- घर से क्लेश और दरिद्रता का नाश: “नमो-नमो त्रैलोक्य वन्दिनी, दुखदारिद्रादिक निकन्दिनी” — घर के भीतर कलह, अशांति और तनाव का वातावरण समाप्त होकर शीतलता, प्रेम और धन-धान्य की वृद्धि होती है।
- मन की शांति और सात्विक बुद्धि: “होय विमल शीतल हृदय, विकसै बुद्धि बलज्ञान” — क्रोधी स्वभाव वाले व्यक्तियों के मन को यह पाठ शांत करता है और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।
माँ शीतला एवं अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)
माँ शीतला भगवती आद्यशक्ति माँ दुर्गा और भगवान शिव की शक्ति परंपरा से संबंधित हैं। परिवार की पूर्ण रक्षा और आरोग्य हेतु इनके अन्य पावन पाठ भी अवश्य पढ़ें:
- श्री दुर्गा चालीसा पाठ (Durga Chalisa in Hindi) — समस्त संकटों और दुर्गम बाधाओं के नाश हेतु माँ जगदम्बा की पावन चालीसा।
- श्री गंगा चालीसा पाठ (Ganga Chalisa in Hindi) — पाप-ताप शमन और मोक्षदायिनी माँ गंगा की पावन 40 चौपाइयां।
- श्री शिव चालीसा पाठ (Shiv Chalisa in Hindi) — देवाधिदेव महादेव शिव की संपूर्ण चालीसा एवं सरल भावार्थ।
- श्री दुर्गा आरती (Jai Ambe Gauri) — माँ अंबे गौरी की विश्वविख्यात सर्वकल्याणकारी आरती।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्र.श्री शीतला चालीसा का पाठ विशेष रूप से कब और किस दिन करना चाहिए?
शीतला चालीसा का पाठ विशेष रूप से चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि यानी 'शीतला अष्टमी' (बासोड़ा पूजा) के दिन अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मास की सप्तमी व अष्टमी तिथि अथवा मंगलवार और शुक्रवार के दिन इसका पाठ करने से घर में संक्रामक रोगों और दाह-ज्वर का प्रकोप शांत होता है।
प्र.बासोड़ा पूजा क्या है और माँ शीतला को बासी भोजन का भोग क्यों लगाया जाता है?
शीतला अष्टमी को लोकभाषा में 'बासोड़ा' कहा जाता है। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता, बल्कि एक दिन पूर्व (सप्तमी की शाम) बने हुए ठंडे व बासी पकवान (जैसे मीठे चावल, पूड़ी, राबड़ी) का ही माँ शीतला को भोग अर्पित किया जाता है और प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है। यह परंपरा ऋतु-परिवर्तन के समय शरीर को शीतलता प्रदान करने और संक्रामक बीमारियों से बचाने का वैज्ञानिक व धार्मिक प्रतीक है।
प्र.शीतला चालीसा का पाठ करने से बच्चों को क्या विशेष लाभ मिलता है?
चालीसा में स्पष्ट उल्लेख है — 'शोकहरी शंकरी भवानी, बाल-प्राणरक्षी सुख दानी'। माँ शीतला को बालकों की रक्षक देवी माना गया है। जिन बच्चों को बार-बार तेज बुखार, खसरा, फुंसियां या त्वचा रोग होते हैं, उनके सिर पर नीम के पत्ते फेरकर यदि माता-पिता शीतला चालीसा का पाठ करें, तो बच्चों को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ और आरोग्य प्राप्त होता है।
प्र.घर पर शीतला चालीसा पाठ करने की सही पूजन सामग्री क्या है?
पाठ के लिए एक कलश में शीतल जल रखें, साथ में ताजे नीम के पत्ते, रोली, हल्दी, अक्षत, कच्चा दूध, दही और बासी हलवा-पूड़ी या मीठे भात का नैवेद्य रखें। माँ को गर्म दीप की लौ अधिक समीप न रखें, केवल श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर शीतल जल और नीम दल अर्पित करते हुए चालीसा का शांत स्वर में पाठ करें।
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नित्य पूजा एवं पाठ हेतु उच्च गुणवत्ता वाली प्रिंटेबल PDF (दोहा एवं ४० चौपाइयाँ सरल हिंदी भावार्थ सहित)