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नरसिंह

नरसिंह चालीसा— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Narasimha Chalisa

भक्त प्रह्लाद की रक्षा हेतु खंभे से प्रकट हुए उग्र रक्षक भगवान नृसिंह की यह चालीसा — श्रद्धा से पाठ करने पर भय, नजर दोष और संकट का नाश होकर अभय एवं कल्याण की प्राप्ति होती है।

परंपरागत७ मिनट पाठ

नरसिंह चालीसा संपूर्ण पाठ

दोहा एवं ४० चौपाइयाँ सरल हिंदी भावार्थ सहित

प्रारंभिक दोहा

मास वैशाख कृतिका युत, हरण मही को भार।

शुक्ल चतुर्दशी सोम दिन, लियो नरसिंह अवतार॥

अर्थ: वैशाख मास में, कृतिका नक्षत्र के योग में, शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को, सोमवार के दिन प्रभु ने पृथ्वी का भार हरने के लिए नरसिंह अवतार धारण किया।

धन्य तुम्हारो सिंह तनु, धन्य तुम्हारो नाम।

तुमरे सुमरन से प्रभु, पूरन हो सब काम॥

अर्थ: हे प्रभु! आपका यह सिंह-स्वरूप शरीर धन्य है और आपका नाम भी धन्य है; आपके स्मरण मात्र से भक्त के समस्त कार्य सहज ही सिद्ध हो जाते हैं।

चौपाई

नरसिंह देव मैं सुमरों तोहि।

धन बल विद्या दान दे मोहि॥

अर्थ: हे नरसिंह देव! मैं श्रद्धापूर्वक आपका स्मरण करता हूं; कृपया मुझे धन, बल और विद्या का दान प्रदान कीजिए।

जय जय नरसिंह कृपाला।

करो सदा भक्तन प्रतिपाला॥

अर्थ: हे कृपालु नरसिंह भगवान! आपकी सदा जय हो; आप सदैव अपने भक्तों का पालन-पोषण करते हैं।

विष्णु के अवतार दयाला।

महाकाल कालन को काला॥

अर्थ: आप भगवान विष्णु के दयालु अवतार हैं, और साक्षात काल को भी नियंत्रित करने वाले महाकाल के काल हैं — अर्थात मृत्यु का भी अंत करने वाले हैं।

नाम अनेक तुम्हारो बखानो।

अल्प बुद्धि मैं ना कछु जानों॥

अर्थ: आपके अनेक नामों का गुणगान शास्त्रों में हुआ है, परंतु मेरी अल्प बुद्धि आपकी महिमा को पूर्णतः नहीं जान सकती।

हिरणाकुश नृप अति अभिमानी।

तेहि के भार मही अकुलानी॥

अर्थ: हिरण्यकशिपु नामक राजा अत्यंत अहंकारी था, जिसके अत्याचार के भार से पृथ्वी व्याकुल हो उठी थी।

हिरणाकुश कयाधू के जाये।

नाम भक्त प्रहलाद कहाये॥

अर्थ: उसी हिरण्यकशिपु और माता कयाधु के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ, जो आगे चलकर भक्त प्रह्लाद के नाम से विख्यात हुआ।

भक्त बना बिष्णु को दासा।

पिता कियो मारन परसाया॥

अर्थ: प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त व दास बन गया, जिस कारण उसके अपने पिता ने ही बार-बार उसे मार डालने का प्रयास किया।

अस्त्र-शस्त्र मारे भुज दण्डा।

अग्निदाह कियो प्रचण्डा॥

अर्थ: हिरण्यकशिपु ने उसे अस्त्र-शस्त्रों और भुजबल से मारने का प्रयत्न किया, यहां तक कि प्रचंड अग्नि में भी झोंकने का प्रयास किया।

भक्त हेतु तुम लियो अवतारा।

दुष्ट-दलन हरण महिभारा॥

अर्थ: अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा हेतु ही आपने यह अवतार लिया, दुष्टों का नाश करके और पृथ्वी का भार हरकर।

तुम भक्तन के भक्त तुम्हारे।

प्रह्लाद के प्राण पियारे॥

अर्थ: आप अपने भक्तों के सच्चे हितैषी हैं, और प्रह्लाद तो आपको अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय था।

प्रगट भये फाड़कर तुम खम्भा।

देख दुष्ट-दल भये अचम्भा॥

अर्थ: आप खंभे को फाड़कर अचानक प्रकट हुए, और आपके इस अद्भुत स्वरूप को देखकर समस्त दुष्ट दल आश्चर्यचकित रह गया।

खड्ग जिह्व तनु सुन्दर साजा।

ऊर्ध्व केश महादष्ट्र विराजा॥

अर्थ: आपकी तलवार-सी तीक्ष्ण जिह्वा और सुंदर शरीर अद्भुत रूप से सजा हुआ था; आपके ऊर्ध्व केश और विशाल दाढ़ें अत्यंत विराजमान थीं।

तप्त स्वर्ण सम बदन तुम्हारा।

को वरने तुम्हरों विस्तारा॥

अर्थ: आपका मुखमंडल तपे हुए स्वर्ण के समान तेजोमय था; आपकी महिमा के विस्तार का वर्णन भला कौन कर सकता है।

रूप चतुर्भुज बदन विशाला।

नख जिह्वा है अति विकराला॥

अर्थ: आपका चार भुजाओं वाला रूप और विशाल मुख अत्यंत तेजस्वी था; आपके नख और जिह्वा दुष्टों के लिए अत्यंत विकराल थे।

स्वर्ण मुकुट बदन अति भारी।

कानन कुण्डल की छवि न्यारी॥

अर्थ: आपके मस्तक पर स्वर्ण मुकुट अत्यंत भारी और शोभायमान था; आपके कानों में कुंडलों की छवि निराली थी।

भक्त प्रहलाद को तुमने उबारा।

हिरणा कुश खल क्षण मह मारा॥

अर्थ: आपने अपने भक्त प्रह्लाद को बचा लिया, और दुष्ट हिरण्यकशिपु का क्षणभर में ही वध कर दिया।

ब्रह्मा, बिष्णु तुम्हे नित ध्यावे।

इन्द्र महेश सदा मन लावे॥

अर्थ: ब्रह्मा और विष्णु भी नित्य आपका ध्यान करते हैं; इन्द्र और महेश (शिव) भी सदा आपके चिंतन में मन लगाए रखते हैं।

वेद पुराण तुम्हरो यश गावे।

शेष शारदा पारन पावे॥

अर्थ: समस्त वेद और पुराण आपके यश का गान करते हैं; शेषनाग और माता शारदा भी आपकी महिमा का पार नहीं पाते।

जो नर धरो तुम्हरो ध्याना।

ताको होय सदा कल्याना॥

अर्थ: जो भी मनुष्य आपका ध्यान धारण करता है, उसका सदा ही कल्याण होता है।

त्राहि-त्राहि प्रभु दुःख निवारो।

भव बन्धन प्रभु आप ही टारो॥

अर्थ: हे प्रभु! मेरी पुकार सुनिए — मेरे दुखों का निवारण कीजिए, और मुझे इस संसार के बंधन से आप ही मुक्त कीजिए।

नित्य जपे जो नाम तिहारा।

दुःख व्याधि हो निस्तारा॥

अर्थ: जो भी साधक नित्य आपके नाम का जप करता है, उसके समस्त दुख और रोग दूर हो जाते हैं।

सन्तान-हीन जो जाप कराये।

मन इच्छित सो नर सुत पावे॥

अर्थ: जो संतानहीन दंपति श्रद्धापूर्वक आपका जाप करवाते हैं, वे मनोवांछित संतान को प्राप्त करते हैं।

बन्ध्या नारी सुसन्तान को पावे।

नर दरिद्र धनी होई जावे॥

अर्थ: निःसंतान स्त्री भी सुसंतान को प्राप्त करती है, और दरिद्र मनुष्य भी आपकी कृपा से धनवान बन जाता है।

जो नरसिंह का जाप करावे।

ताहि विपत्ति सपनें नही आवे॥

अर्थ: जो भी भक्त श्रद्धापूर्वक नरसिंह भगवान का जाप करता है, उसे स्वप्न में भी कोई विपत्ति स्पर्श नहीं कर पाती।

जो कामना करे मन माही।

सब निश्चय सो सिद्ध हुयी जाही॥

अर्थ: भक्त जो भी शुभ कामना अपने मन में धारण करता है, वह निश्चित रूप से सिद्ध हो जाती है।

जीवन मैं जो कछु सङ्कट होयी।

निश्चय नरसिंह सुमरे सोयी॥

अर्थ: जीवन में जब भी कोई संकट उपस्थित हो, निश्चिंत होकर नरसिंह भगवान का ही स्मरण करना चाहिए।

रोग ग्रसित जो ध्यावे कोई।

ताकि काया कञ्चन होई॥

अर्थ: जो भी रोगग्रस्त व्यक्ति श्रद्धापूर्वक आपका ध्यान करता है, उसकी काया स्वर्ण के समान निरोगी व कांतिमय हो जाती है।

डाकिनी-शाकिनी प्रेत बेताला।

ग्रह-व्याधि अरु यम विकराला॥

अर्थ: डाकिनी, शाकिनी, प्रेत, बेताल, ग्रहों की बाधा और स्वयं विकराल यमराज भी आपके भक्त के निकट नहीं आ सकते।

प्रेत पिशाच सबे भय खाये।

यम के दूत निकट नहीं आवे॥

अर्थ: प्रेत-पिशाच सभी आपके नाम से भयभीत होकर दूर भाग जाते हैं; यमराज के दूत भी भक्त के निकट आने का साहस नहीं करते।

सुमर नाम व्याधि सब भागे।

रोग-शोक कबहूँ नही लागे॥

अर्थ: आपके नाम का स्मरण करते ही समस्त व्याधियां भाग जाती हैं; रोग और शोक कभी भी भक्त को स्पर्श नहीं कर पाते।

जाको नजर दोष हो भाई।

सो नरसिंह चालीसा गाई॥

अर्थ: जिस किसी को नजर दोष (बुरी नजर) लगा हो, उसे यह नरसिंह चालीसा गानी चाहिए।

हटे नजर होवे कल्याना।

बचन सत्य साखी भगवाना॥

अर्थ: ऐसा करने से नजर दोष हट जाता है और कल्याण होता है; यह वचन सत्य है, स्वयं भगवान इसके साक्षी हैं।

जो नर ध्यान तुम्हारो लावे।

सो नर मन वाञ्छित फल पावे॥

अर्थ: जो भी मनुष्य आपमें अपना ध्यान लगाता है, वह अपने मनोवांछित फल को निश्चित ही प्राप्त करता है।

बनवाये जो मन्दिर ज्ञानी।

हो जावे वह नर जग मानी॥

अर्थ: जो ज्ञानी भक्त श्रद्धापूर्वक आपका मंदिर बनवाता है, वह संसार में सम्मान और कीर्ति को प्राप्त करता है।

नित-प्रति पाठ करे इक बारा।

सो नर रहे तुम्हारा प्यारा॥

अर्थ: जो भक्त प्रतिदिन एक बार भी इस चालीसा का पाठ करता है, वह सदा आपका प्रिय बना रहता है।

नरसिंह चालीसा जो जन गावे।

दुःख दरिद्र ताके निकट न आवे॥

अर्थ: जो भी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक यह नरसिंह चालीसा गाता है, दुख और दरिद्रता उसके निकट नहीं फटकती।

चालीसा जो नर पढ़े-पढ़ावे।

सो नर जग में सब कुछ पावे॥

अर्थ: जो स्वयं इस चालीसा का पाठ करता है और दूसरों से भी करवाता है, वह इस संसार में सब कुछ प्राप्त कर लेता है।

यह श्री नरसिंह चालीसा।

पढ़े रङ्क होवे अवनीसा॥

अर्थ: यह श्री नरसिंह चालीसा इतनी प्रभावशाली है कि इसका पाठ करने से एक दरिद्र व्यक्ति भी राजाओं के समान वैभव को प्राप्त कर लेता है।

जो ध्यावे सो नर सुख पावे।

तोही विमुख बहु दुःख उठावे॥

अर्थ: जो आपका ध्यान करता है, वह सुख पाता है; किंतु जो आपसे विमुख रहता है, वह अनेक दुखों को सहता है।

शिव स्वरूप है शरण तुम्हारी।

हरो नाथ सब विपत्ति हमारी॥

अर्थ: आप स्वयं शिवस्वरूप हैं और हम आपकी शरण में हैं; हे नाथ! हमारी समस्त विपत्तियों का हरण कीजिए।

समापन दोहा

चारों युग गायें तेरी, महिमा अपरम्पार।

निज भक्तनु के प्राण हित, लियो जगत अवतार॥

अर्थ: चारों युगों में आपकी अपरंपार महिमा का गान होता रहा है; अपने भक्तों के प्राणों की रक्षा के लिए ही आपने इस जगत में अवतार लिया।

नरसिंह चालीसा जो पढ़े, प्रेम मगन शत बार।

उस घर आनन्द रहे, वैभव बढ़े अपार॥

अर्थ: जो भक्त प्रेममग्न होकर इस नरसिंह चालीसा का सौ बार पाठ करता है, उसके घर में सदा आनंद बना रहता है और वैभव अपार रूप से बढ़ता है।

श्री नरसिंह चालीसा का महत्व एवं परिचय

जब अधर्म को यह विश्वास हो जाए कि उसे न दिन छू सकता है, न रात; न कोई मनुष्य मार सकता है, न कोई पशु; न घर के भीतर कोई अस्त्र चल सकता है, न बाहर — तभी भगवान एक ऐसे रूप में प्रकट होते हैं, जो इन सभी सीमाओं से परे हो। यही भगवान नृसिंह का स्वरूप है: संध्याकाल में, एक खंभे की देहरी पर, आधे नर और आधे सिंह के रूप में प्रकट होकर उन्होंने सिद्ध किया कि सच्ची भक्ति के सामने कोई वरदान, कोई अहंकार टिक नहीं सकता।

भक्त प्रह्लाद की निष्ठा ही इस चालीसा की आत्मा है। पिता हिरण्यकशिपु के अत्याचार, अग्नि, शस्त्र — कुछ भी उस बालक की भक्ति को डिगा न सका, और अंततः प्रभु स्वयं उसकी रक्षा के लिए प्रकट हुए। नरसिंह चालीसा इसी उग्र किंतु वात्सल्यपूर्ण रक्षक रूप का स्मरण है — जहां एक ओर दुष्टों के लिए विकराल रूप है, वहीं भक्त के लिए वही रूप शरण और अभय का प्रतीक है।

परंपरागत रूप से यह चालीसा विशेष रूप से नजर दोष, भय, नकारात्मक शक्तियों और संकट के समय पाठ की जाती है — जैसा चालीसा की पंक्तियां स्वयं कहती हैं। जो भक्त श्रद्धापूर्वक इसका पाठ करता है, उसके भीतर यह दृढ़ विश्वास जगता है कि कोई भी परिस्थिति, चाहे कितनी भी असंभव क्यों न लगे, भगवान की कृपा से टल सकती है।

श्री नरसिंह चालीसा पाठ करने की सही विधि एवं नियम

भगवान नृसिंह की उपासना में श्रद्धा और निर्भयता का भाव विशेष महत्व रखता है:

  1. विशेष दिन: वैशाख शुक्ल चतुर्दशी (नृसिंह जयंती) इस पाठ के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है; भय या संकट के समय अन्य किसी भी दिन भी पाठ किया जा सकता है।
  2. स्थान एवं दिशा: स्नान कर पवित्र होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।
  3. पूजन सामग्री: लाल अथवा पीले पुष्प, कुमकुम और नारियल अर्पित करें।
  4. दीप प्रज्वलन: घी का दीपक जलाकर शांत व एकाग्र मन से पाठ आरंभ करें।
  5. पाठ: प्रारंभिक दोहों, चालीस चौपाइयों और समापन दोहों का श्रद्धापूर्वक पाठ करें; विशेष संकट में इसे शत बार (सौ बार) पढ़ने का भी विधान है, जैसा समापन दोहे में वर्णित है।

श्री नरसिंह चालीसा पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

नरसिंह चालीसा के श्रद्धापूर्वक पाठ से साधक को निम्नलिखित विशिष्ट लाभ प्राप्त होते हैं:

  • नजर दोष से मुक्ति: “जाको नजर दोष हो भाई, सो नरसिंह चालीसा गाई” — बुरी नजर के प्रभाव को दूर करने के लिए यह पाठ विशेष रूप से प्रभावी माना जाता है।
  • भय और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा: “डाकिनी-शाकिनी प्रेत बेताला” — प्रेत-बाधा और भय से सुरक्षा मिलती है।
  • दरिद्रता का नाश: “यह श्री नरसिंह चालीसा, पढ़े रङ्क होवे अवनीसा” — आर्थिक कष्टों से मुक्ति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • संतान-सुख: “सन्तान-हीन जो जाप कराये, मन इच्छित सो नर सुत पावे” — निःसंतान दंपतियों के लिए यह पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
  • संकट में तत्काल सहारा: “त्राहि-त्राहि प्रभु दुःख निवारो” — किसी भी असहनीय कष्ट या भय की घड़ी में यह पुकार शांति और साहस देती है।

नृसिंह भगवान के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

भगवान विष्णु के इस उग्र रक्षक अवतार की पूर्ण कृपा प्राप्ति हेतु इनके अन्य अवतारों के पावन पाठ भी करें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.नरसिंह चालीसा का पाठ विशेष रूप से कब करना चाहिए?

वैशाख शुक्ल चतुर्दशी — नृसिंह जयंती — इस चालीसा के पाठ के लिए सर्वोत्तम दिन माना जाता है, जैसा स्वयं चालीसा के आरंभिक दोहे में वर्णित है। इसके अतिरिक्त भय, नजर दोष या किसी संकट के समय भी इसका पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है।

प्र.नरसिंह चालीसा के पाठ से मुख्य रूप से क्या लाभ होता है?

जैसा चालीसा में स्वयं कहा गया है — 'जाको नजर दोष हो भाई, सो नरसिंह चालीसा गाई' — इसका पाठ विशेष रूप से नजर दोष और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा के लिए किया जाता है। साथ ही यह भय, दरिद्रता और संतानहीनता जैसी समस्याओं में भी सहायक माना जाता है।

प्र.भगवान ने नरसिंह अवतार क्यों लिया था?

अपने अनन्य भक्त प्रह्लाद की रक्षा और अहंकारी राजा हिरण्यकशिपु के वध हेतु भगवान विष्णु ने यह उग्र अवतार लिया — जैसा चालीसा में वर्णित है: 'भक्त हेतु तुम लियो अवतारा, दुष्ट-दलन हरण महिभारा'। हिरण्यकशिपु को मिले विशेष वरदान के कारण उसका वध न दिन में न रात में, न भीतर न बाहर, न मनुष्य से न पशु से संभव था — इसीलिए भगवान ने सांझ के समय खंभे से आधे-नर आधे-सिंह रूप में प्रकट होकर उसका अंत किया।

प्र.क्या नरसिंह चालीसा का पाठ भयभीत व्यक्ति या बच्चों के लिए उपयुक्त है?

हाँ, नरसिंह भगवान को विशेष रूप से भय-नाशक और रक्षक देवता माना जाता है। 'प्रेत पिशाच सबे भय खाये, यम के दूत निकट नहीं आवे' — इस भाव के अनुसार भयभीत व्यक्तियों, बुरे स्वप्नों से ग्रस्त बच्चों और नकारात्मक ऊर्जा से परेशान किसी भी श्रद्धालु के लिए यह पाठ अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है।

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