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लक्ष्मी स्तोत्र

लक्ष्मी स्तोत्र— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Laxmi Stotra

देवराज इन्द्र द्वारा रचित यह पावन इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र जीवन से दरिद्रता का समूल नाश कर अक्षय धन, ऐश्वर्य, सद्बुद्धि और माँ महालक्ष्मी की असीम कृपा प्रदान करता है।

देवराज इन्द्र (ब्रह्मवैवर्त पुराण)७ मिनट पाठ

लक्ष्मी स्तोत्र संपूर्ण पाठ

पावन श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित

प्रारंभ

॥ ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः ॥

अथ इन्द्रकृतं श्रीलक्ष्मीस्तोत्रम्

इन्द्र उवाच

अर्थ: देवराज इन्द्र हाथ जोड़कर भगवती महालक्ष्मी के श्रीचरणों में नतमस्तक होकर स्तुति करते हुए कहते हैं —

श्लोक १

ॐ नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः।

कृष्णप्रियायै सारायै पद्मायै च नमो नमः॥ १॥

अर्थ: कमल के पुष्प पर निवास करने वाली, भगवान नारायण की आद्यशक्ति नारायणी! आपको बारंबार नमस्कार है। भगवान श्रीकृष्ण की नित्य आल्हादिनी प्रिया, संपूर्ण सृष्टि के सार-तत्त्व और कमल के समान पावन पद्मा देवी को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है।

श्लोक २

पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः।

पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः॥ २॥

अर्थ: कमल-दल के समान विशाल व करुणामय नेत्रों वाली और खिले हुए कमल के समान परम सुंदर मुख वाली माता! आपको नमस्कार है। पद्मासन पर सुशोभित, कमलों के वन में विहार करने वाली पद्मिनी और भगवान विष्णु की शक्ति वैष्णवी देवी को मेरा सादर नमन है।

श्लोक ३

सर्वसम्पत्स्वरूपायै सर्वदात्र्यै नमो नमः।

सुखदायै मोक्षदायै सिद्धिदायै नमो नमः॥ ३॥

अर्थ: संसार की समस्त संपदाओं, ऐश्वर्य और सुखों की साक्षात् स्वरूप तथा सभी जीवों को सब कुछ प्रदान करने वाली सर्वदात्री माता! आपको नमन है। भक्तों को सांसारिक सुख, परम मोक्ष और समस्त अलौकिक सिद्धियां देने वाली देवी को मेरा बारंबार प्रणाम है।

श्लोक ४

हरिभक्तिप्रदात्र्यै च हर्षदात्र्यै नमो नमः।

कृष्णवक्षःस्थितायै च कृष्णेशायै नमो नमः॥ ४॥

अर्थ: भगवान श्रीहरि के पावन चरणों में अनन्य भक्ति प्रदान करने वाली और जीवन में सच्चा हर्ष व आनंद भरने वाली माता! आपको नमस्कार है। भगवान श्रीकृष्ण के वक्षःस्थल पर सदा विराजने वाली और उनकी ईश्वरी शक्ति को मेरा सादर प्रणाम है।

श्लोक ५

कृष्णशोभास्वरूपायै रत्नपद्मे च शोभने।

सम्पत्त्यधिष्ठातृदेव्यै महादेव्यै नमो नमः॥ ५॥

अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण के संपूर्ण सौंदर्य और शोभा का साक्षात् स्वरूप तथा दिव्य रत्नों से जड़े कमल पर शोभा पाने वाली माता! चराचर जगत् के समस्त ऐश्वर्य और वैभव की अधिष्ठात्री महादेवी को मेरा बार-बार नमस्कार है।

श्लोक ६

शस्याधिष्ठातृदेव्यै च शस्यायै च नमो नमः।

नमो बुद्धिस्वरूपायै बुद्धिदायै नमो नमः॥ ६॥

अर्थ: धरती के समस्त अन्न, फसलों और धान्य की अधिष्ठात्री तथा स्वयं अन्न-धन के रूप में व्याप्त देवी! आपको प्रणाम है। साक्षात् सद्बुद्धि के स्वरूप और साधकों को निर्मल विवेक व ज्ञान प्रदान करने वाली माता को मेरा नमन है।

श्लोक ७

वैकुण्ठे या महालक्ष्मीर्लक्ष्मीः क्षीरोदसागरे।

स्वर्गलक्ष्मीरिन्द्रगेहे राजलक्ष्मीर्नृपालये॥ ७॥

अर्थ: जो भगवती वैकुण्ठ धाम में महालक्ष्मी रूप में, क्षीरसागर में समुद्र-तनया लक्ष्मी रूप में, अमरावती में इन्द्र के भवन में स्वर्गलक्ष्मी रूप में और भूलोक में राजाओं के महलों में राजलक्ष्मी के रूप में प्रतिष्ठित हैं, उन सर्वव्यापी देवी को मेरा नमन है।

श्लोक ८

गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां गेहे च गृहदेवता।

सुरभिः सा गवां माता दक्षिणा यज्ञकामिनी॥ ८॥

अर्थ: जो गृहस्थों के घरों में सुख-शांति प्रदायिनी गृहलक्ष्मी और कुल की अधिष्ठात्री गृहदेवता हैं; जो गौमाता के रूप में समस्त कामनाएं पूर्ण करने वाली कामधेनु 'सुरभि' हैं और यज्ञ-अनुष्ठानों को सफल बनाने वाली 'दक्षिणा' हैं — उन भगवती को मेरा प्रणाम है।

श्लोक ९

अदितिर्देवमाता त्वं कमला कमलालये।

स्वाहा त्वं च हविर्दाने कव्यदाने स्वधा स्मृता॥ ९॥

अर्थ: हे देवी! आप ही समस्त देवताओं को जन्म देने वाली देवमाता 'अदिति' हैं और कमल में वास करने वाली 'कमला' हैं। यज्ञों में देव-आहुति देते समय आप 'स्वाहा' रूप में तथा पितरों को तर्पण करते समय आप 'स्वधा' रूप में पूजी जाती हैं।

श्लोक १०

त्वं हि विष्णुस्वरूपा च सर्वाधारा वसुन्धरा।

शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं नारायणपरायणा॥ १०॥

अर्थ: हे माता! आप भगवान विष्णु की अभिन्न शक्ति हैं और सबको अपनी गोद में धारण करने वाली साक्षात् 'वसुंधरा' (पृथ्वी) हैं। आप विशुद्ध सत्त्वगुणमयी हैं और सदा अपने प्रभु श्रीनारायण के ध्यान व सेवा में तत्पर रहती हैं।

श्लोक ११

क्रोधहिंसावर्जिता च वरदा च शुभानना।

परमार्थप्रदा त्वं च हरिदास्यप्रदा परा॥ ११॥

अर्थ: आप क्रोध और हिंसा से सर्वथा मुक्त, परम शांत और मनोहर मुख वाली वरदायिनी माता हैं। आप साधकों को जीवन का परमार्थ (मोक्ष) देने वाली और भगवान श्रीहरि की पावन दास्य-भक्ति प्रदान करने वाली पराशक्ति हैं।

श्लोक १२

यया विना जगत् सर्वं भस्मीभूतमसारकम्।

जीवन्मृतं च विश्वं च शश्वत् सर्वं यया विना॥ १२॥

अर्थ: हे माता! आपकी कृपा के बिना यह संपूर्ण जगत् राख के ढेर के समान निस्तेज और असार हो जाता है। आपकी दृष्टि के अभाव में यह सारा संसार जीवित रहते हुए भी मृतक के समान चेतना-शून्य प्रतीत होता है।

श्लोक १३

सर्वेषां च परा माता सर्वबान्धवरूपिणी।

धर्मार्थकाममोक्षाणां त्वं च कारणरूपिणी॥ १३॥

अर्थ: आप चराचर जगत् के समस्त जीवों की परम स्नेहमयी माता और संकट में साथ निभाने वाली आत्मीय बंधुरूपिणी हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का मूल कारण आप ही हैं।

श्लोक १४

यथा माता स्तनान्धानां शिशूनां शैशवे सदा।

तथा त्वं सर्वदा माता सर्वेषां सर्वरूपतः॥ १४॥

अर्थ: जैसे एक माता अपनी गोद के अबोध शिशु का बचपन में वात्सल्यपूर्वक पालन-पोषण करती है, उसी प्रकार हे जगज्जननी! आप भी समस्त प्राणियों का हर रूप में निरंतर पालन, पोषण और रक्षा करती हैं।

श्लोक १५

मातृहीनः स्तनत्यक्तः स चेज्जीवति दैवतः।

त्वया हीनो जनः कोऽपि न जीवत्येव निश्चितम्॥ १५॥

अर्थ: माता से बिछड़ा और दूध से वंचित बालक भी शायद भाग्यवश जीवित रह जाए, परंतु हे देवी! आपकी कृपा-दृष्टि से वंचित कोई भी मनुष्य इस संसार में सुखपूर्वक कभी जीवित नहीं रह सकता — यह अकाट्य सत्य है।

श्लोक १६

सुप्रसन्नस्वरूपा त्वं मां प्रसन्ना भवाम्बिके।

वैरिग्रस्तं च विषयं देहि मह्यं सनातनि॥ १६॥

अर्थ: हे सदा प्रसन्न और करुणामयी रहने वाली माँ अम्बिके! मुझ पर भी प्रसन्न हो जाइए। हे सनातनी शक्ति! शत्रुओं द्वारा छीन लिया गया मेरा खोया हुआ देव-लोक और राज्य-ऐश्वर्य मुझे पुनः प्रदान कीजिए।

श्लोक १७

वयं यावत् त्वया हीना बन्धुहीनाश्च भिक्षुकाः।

सर्वसम्पद्विहीनाश्च तावदेव हरिप्रिये॥ १७॥

अर्थ: हे हरिप्रिये! जब तक कोई मनुष्य आपकी कृपा से वंचित रहता है, तभी तक वह बंधु-बांधवों से हीन, भिक्षुक और समस्त धन-संपदाओं से रिक्त होकर भटकता है। आपकी दृष्टि पड़ते ही दरिद्र भी राजा बन जाता है।

श्लोक १८

राज्यं देहि श्रियं देहि रूपं देहि शुभानने।

कीर्तिं देहि धनं देहि यशो मह्यं च देहि वै॥ १८॥

अर्थ: हे शुभ मुख वाली मंगलमयी माता! मुझे राज्य, लक्ष्मी, कांति, संसार में कीर्ति, अक्षय धन और निर्मल यश प्रदान कीजिए।

श्लोक १९

कामं देहि मतिं देहि भोगान् देहि हरिप्रिये।

ज्ञानं देहि च धर्मं च सर्वसौभाग्यमीप्सितम्॥ १९॥

अर्थ: हे विष्णुप्रिया! मुझे मनोवांछित सिद्धि, श्रेष्ठ बुद्धि, धर्मानुकूल सुख-भोग, तत्त्वज्ञान, धर्म-निष्ठा और मनचाहा समस्त सौभाग्य प्रदान कीजिए।

श्लोक २०

प्रभावं च प्रतापं च जयं सर्वत्र मे कुरु।

बलं वीर्यं च शिष्येभ्यो ज्ञानं देहि सनातनि॥ २०॥

अर्थ: हे सनातनी देवी! मुझे तेज, पराक्रम और सब क्षेत्रों में विजय प्रदान कीजिए। हमारे भीतर आत्मबल, सामर्थ्य और श्रेष्ठ ज्ञान का प्रकाश भर दीजिए।

फलश्रुति

इदं स्तोत्रं महापुण्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।

कुबेरतुल्यः स भवेद् राजराजेश्वरो महान्॥ २१॥

अर्थ: जो भी मनुष्य इस परम पावन लक्ष्मी स्तोत्र का तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न और सायं) में नित्य पाठ करता है, वह धन के देवता कुबेर के समान समृद्ध और महान ऐश्वर्यशाली बन जाता है।

फलश्रुति

पञ्चलक्षजपेनैव स्तोत्रसिद्धिर्भवेन्नृणाम्।

सिद्धस्तोत्रं यदि पठेन्मासमेकं तु सन्ततम्॥

महासुखी च राजेन्द्रो भविष्यति न संशयः॥ २२॥

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे प्रकृतिखण्डे इन्द्रकृतं लक्ष्मीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

अर्थ: पाँच लाख जप से साधक को इस स्तोत्र की सिद्धि प्राप्त होती है। यदि कोई व्यक्ति सिद्ध होने पर एक मास तक निरंतर इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करे, तो वह जीवन में महासुखी और राजाओं के समान सम्मानित होता है — इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है।

श्री लक्ष्मी स्तोत्र का महत्व एवं परिचय

जीवन में जब अचानक धन का अभाव छा जाए, बनी-बनाई प्रतिष्ठा बिखरने लगे और कठोर परिश्रम के बाद भी चारों ओर से असफलता और दरिद्रता घेर ले, तब शास्त्रों में केवल एक ही शक्ति का आश्रय लेने का विधान है — वह हैं साक्षात् भगवती महालक्ष्मी। धन केवल मुद्राओं का नाम नहीं है; शास्त्रों में धन का अर्थ है परिवार का स्वास्थ्य, चेहरे का तेज, घर का अन्न-धान्य, समाज में मान-प्रतिष्ठा और चित्त की शांति। जब माँ लक्ष्मी किसी पर कृपा करती हैं, तो रंक भी राजा बन जाता है, और जब वे विमुख होती हैं, तो देवराज इन्द्र को भी भिक्षुक की तरह भटकना पड़ता है।

श्री लक्ष्मी स्तोत्र (Shri Lakshmi Stotram), जिसे पौराणिक ग्रंथों में इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र (Indrakrit Lakshmi Stotram) के नाम से जाना जाता है, ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड (अध्याय ३९) तथा देवीभागवत पुराण में वर्णित एक अत्यंत सिद्ध एवं तेजस्वी स्तुति है। पौराणिक आख्यान के अनुसार, जब देवराज इन्द्र के प्रमाद से रुष्ट होकर महर्षि दुर्वासा ने उन्हें श्रीहीन होने का शाप दे दिया, तब स्वर्ग की संपूर्ण समृद्धि, तेज और विजय समाप्त हो गई और माता लक्ष्मी क्षीरसागर में विलीन हो गईं। तीनों लोकों में हाहाकार मचने पर देवराज इन्द्र ने हाथ जोड़कर, अश्रुपूर्ण नेत्रों से माता महालक्ष्मी के इस विराट स्वरूप की स्तुति की।

बाईस श्लोकों की इस अनुपम स्तुति में देवराज इन्द्र ने देवी के केवल धन-दायिनी रूप की नहीं, बल्कि उनके ब्रह्मांड-व्यापी मातृस्वरूप की वंदना की है। वे कहते हैं कि वैकुण्ठ में आप महालक्ष्मी हैं, क्षीरसागर में समुद्र-तनया हैं, स्वर्ग में स्वर्गलक्ष्मी हैं, राजाओं के महलों में राजलक्ष्मी हैं, गृहस्थों के घर में गृहलक्ष्मी हैं और गौमाता के रूप में साक्षात् कामधेनु सुरभि हैं। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह साधक को केवल भौतिक संपत्ति ही नहीं देता, बल्कि भगवान श्रीहरि की दास्य-भक्ति, निर्मल सद्बुद्धि और धर्म-निष्ठा का वरदान भी देता है।

श्री लक्ष्मी स्तोत्र पाठ करने की सही विधि एवं नियम

माँ महालक्ष्मी की आराधना में स्वच्छता, पवित्रता और एकाग्रता का विशेष महत्व है। इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करें:

  1. शुभ दिन एवं काल: शुक्रवार का दिन, पूर्णिमा तिथि, धनतेरस, दीपावली की रात्रि और नवरात्रि के दिन इस पाठ हेतु सर्वोत्तम हैं। प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के उपरांत सूर्योदय के समय या सायंकाल गोधूलि वेला में दीपक प्रज्वलित कर पाठ करें।
  2. दिशा एवं आसन: पूजा स्थल में उत्तर या ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा की ओर मुख करके बैठें। बैठने के लिए लाल या पीले रंग के ऊनी या रेशमी आसन का उपयोग करें।
  3. दीपक एवं धूप: माँ लक्ष्मी के समक्ष गाय के शुद्ध घी का अखंड दीपक या तिल के तेल का दीपक जलाएं। साथ में सुगंधित धूप या अगरबत्ती लगाएं।
  4. पूजन सामग्री एवं अर्पण: देवी की प्रतिमा या चित्र पर कुमकुम, अक्षत, चंदन और लाल पुष्प (विशेषकर कमल या लाल गुलाब) अर्पित करें। भोग के रूप में गाय के दूध से बनी खीर, बताशे, मखाने, सफेद मिष्ठान्न या मौसमी फल चढ़ाएं।
  5. पाठ की संख्या: दैनिक साधना में इस स्तोत्र का १, ३ या ११ बार पाठ करना अत्यंत शुभ होता है। आर्थिक संकट के समय शुक्रवार से आरंभ कर लगातार २१ या ४१ दिनों तक इसका नित्य ११ बार पाठ करने का संकल्प लें।
  6. उच्चारण एवं भाव: संस्कृत श्लोकों का पाठ शांत और स्पष्ट स्वर में करें। पाठ करते समय अपने हृदय में यह विश्वास रखें कि जगज्जननी महालक्ष्मी आपके घर में साक्षात् पधारकर अपनी कृपा बरसा रही हैं।

श्री लक्ष्मी स्तोत्र पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र के नियमित पाठ से साधक के जीवन में चमत्कारी आध्यात्मिक और भौतिक परिवर्तन घटित होते हैं:

  • घोर दरिद्रता और कर्ज से मुक्ति: ‘वयं यावत् त्वया हीना बन्धुहीनाश्च भिक्षुकाः, सर्वसम्पद्विहीनाश्च तावदेव हरिप्रिये’ — स्तोत्र का यह श्लोक प्रमाणित करता है कि माँ की कृपा दृष्टि पड़ते ही मनुष्य के जीवन से दरिद्रता और कंगाली का समूल नाश हो जाता है।
  • खोए हुए वैभव और प्रतिष्ठा की पुनः प्राप्ति: ‘वैरिग्रस्तं च विषयं देहि मह्यं सनातनि’ — जिस प्रकार इन्द्र को उनका छीना गया स्वर्ग-राज्य पुनः मिल गया था, उसी प्रकार व्यापार में घाटा, नौकरी में रुकावट या खोया हुआ सामाजिक सम्मान इस पाठ से पुनः प्राप्त होता है।
  • कुबेर के समान अक्षय धन-धान्य: ‘इदं स्तोत्रं महापुण्यं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः, कुबेरतुल्यः स भवेद् राजराजेश्वरो महान्’ — फलश्रुति के अनुसार तीनों संध्याओं में पाठ करने वाला साधक कुबेर के समान समृद्ध और ऐश्वर्यवान बनता है।
  • घर में सुख-शांति और गृहलक्ष्मी की स्थिरता: ‘गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां गेहे च गृहदेवता’ — जहाँ इस स्तोत्र का नित्य पाठ होता है, वहाँ पारिवारिक कलह समाप्त होती है और घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।
  • सद्बुद्धि और धर्मपरायणता की प्राप्ति: ‘कामं देहि मतिं देहि भोगान् देहि हरिप्रिये, ज्ञानं देहि च धर्मं च सर्वसौभाग्यमीप्सितम्’ — यह स्तोत्र धन के साथ-साथ सही निर्णय लेने की विवेक-बुद्धि और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है।
  • सर्वत्र विजय और पराक्रम की वृद्धि: ‘प्रभावं च प्रतापं च जयं सर्वत्र मे कुरु’ — यह प्रार्थना साधक को हर प्रतियोगिता, व्यापारिक उपक्रम और जीवन के संघर्षों में अजेय विजय प्रदान करती है।

माँ लक्ष्मी के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

भगवती महालक्ष्मी की संपूर्ण कृपा और स्थिर वास हेतु इन पवित्र पाठों का भी नियमपूर्वक अध्ययन करें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ कब और किस समय करना चाहिए?

इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त या संध्याकाल में गोधूलि वेला के समय करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। स्तोत्र की फलश्रुति में 'त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः' कहकर तीनों समय पाठ करने का विधान है। विशेष रूप से शुक्रवार, दीपावली, धनतेरस, शरद पूर्णिमा और नवरात्रि में इसका पाठ करने से त्वरित आर्थिक उन्नति प्राप्त होती है।

प्र.इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र की रचना किसने और किस संदर्भ में की थी?

ब्रह्मवैवर्त पुराण और देवीभागवत पुराण के अनुसार, जब महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण देवराज इन्द्र का संपूर्ण स्वर्ग-वैश्वर्य नष्ट हो गया था, तब इन्द्र ने माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने हेतु 'ॐ नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः' कहकर इस दिव्य स्तुति की रचना की थी। माता लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर इन्द्र को उनका खोया हुआ राज्य और वैभव लौटा दिया था।

प्र.क्या इन्द्रकृत लक्ष्मी स्तोत्र के पाठ से कर्ज और घोर दरिद्रता दूर होती है?

हाँ, यह स्तोत्र दरिद्रता-निवारण और कर्ज-मुक्ति के लिए शास्त्रों में सर्वाधिक प्रभावशाली माना गया है। स्तोत्र के सत्रहवें श्लोक में स्पष्ट कहा गया है — 'वयं यावत् त्वया हीना बन्धुहीनाश्च भिक्षुकाः, सर्वसम्पद्विहीनाश्च तावदेव हरिप्रिये' — अर्थात जब तक मनुष्य पर माँ लक्ष्मी की कृपा नहीं होती, तभी तक वह दीन-हीन रहता है। इस पाठ के नियमित जप से घर में बरकत और धन-आगमन के नए मार्ग खुलते हैं।

प्र.लक्ष्मी स्तोत्र और महालक्ष्मी अष्टक (महालक्ष्म्यष्टकम्) में क्या अंतर है?

महालक्ष्मी अष्टक (नमस्तेऽस्तु महामाये...) पद्म पुराण से लिया गया आठ श्लोकों का संक्षिप्त स्तुति-गान है, जबकि यह लक्ष्मी स्तोत्र ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित देवराज इन्द्र द्वारा रचित २२ श्लोकों का विस्तृत सिद्ध स्तोत्र है, जिसमें देवी के सर्वव्यापक रूपों — वैकुण्ठलक्ष्मी, स्वर्गलक्ष्मी, राजलक्ष्मी और गृहलक्ष्मी — का विस्तार से वंदन कर ऐश्वर्य और मोक्ष मांगा गया है।

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