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माँ गंगा

गंगा चालीसा— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित

Ganga Chalisa

ब्रह्मा के कमंडल, विष्णु के चरणकमल और भगवान शिव की पावन जटाओं से अवतरित पतित-पावनी माँ गंगा की यह पवित्र चालीसा — श्रद्धापूर्वक पाठ करने से त्रिताप, समस्त पाप और भय नष्ट होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सुंदरदास (परंपरागत)८ मिनट पाठ

गंगा चालीसा संपूर्ण पाठ

दोहा एवं ४० चौपाइयाँ सरल हिंदी भावार्थ सहित

प्रारंभिक दोहा

जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग।

जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग॥

अर्थ: हे संपूर्ण जगत को पवित्र करने वाली और देवों की वंदनीय सरिता माँ गंगा! आपकी सदा जय हो। भगवान शिव की जटाओं में वास करने वाली तथा अनुपम व उत्तुंग तरंगों वाली हे कल्याणी माँ! आपकी निरंतर जय-जयकार हो।

चौपाई

जय जय जननि हरनि अघ खानी।

आनन्द करनि गंग महरानी॥

अर्थ: हे समस्त पापों की खान (संसार के घोर पापों) को हरने वाली और भक्तों के हृदय में असीम आनंद का संचार करने वाली माँ गंगा महारानी! आपकी सदा ही जय हो।

जय भागीरथि सुरसरि माता।

कलिमल मूल दलनि विख्याता॥

अर्थ: महाराज भागीरथ की घोर तपस्या से भूतल पर अवतरित होने वाली हे सुरसरि माता! आप कलियुग के समस्त पापों और मलों की जड़ को काट डालने वाली शक्ति के रूप में लोक-विख्यात हैं।

जय जय जह्नु सुता अघ हननी।

भीष्म की माता जग जननी॥

अर्थ: महर्षि जह्नु की पावन सुता (जाह्नवी), पापों का सर्वथा नाश करने वाली, पितामह भीष्म की जन्मदात्री और संपूर्ण जगत का पालन करने वाली हे जगजननी माँ! आपकी जय हो।

धवल कमल दल सम तनु साजे।

लखि शत शरद चन्द्र छवि लाजे॥

अर्थ: आपका पावन स्वरूप श्वेत कमलदल के समान अत्यंत निर्मल और कांतियुक्त सुशोभित है, जिसकी दिव्य आभा को देखकर सैकड़ों शरद पूर्णिमा के चंद्रमा का सौंदर्य भी लज्जित हो जाता है।

वाहन मकर विमल शुचि सोहै।

अमिय कलश कर लखि मन मोहै॥

अर्थ: आपका पवित्र वाहन मकर (मगरमच्छ) अत्यंत सुंदर प्रतीत होता है, और आपके कर-कमलों में अमृत से भरा पावन कलश देखकर समस्त भक्तों का मन मुग्ध हो जाता है।

जड़ित रत्न कंचन आभूषण।

हिय मणि हार हरणि तम दूषण॥

अर्थ: आप स्वर्ण और अमूल्य रत्नों से जड़े आभूषणों से सुसज्जित हैं; आपके वक्षस्थल पर दैदीप्यमान मणियों का पावन हार अज्ञान रूपी अंधकार और समस्त दोषों को हरने वाला है।

जग पावनि त्रय ताप नसावनि।

तरल तरंग तुंग मन भावनि॥

अर्थ: आप संपूर्ण संसार को पवित्र करने वाली तथा जीवों के तीनों तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक, और आध्यात्मिक) का समूल नाश करने वाली हैं; आपकी चंचल और ऊंची लहरें मन को परम आह्लाद देती हैं।

जो गणपति अति पूज्य प्रधाना।

तिहुं ते प्रथम गंग अस्नाना॥

अर्थ: जिन प्रथम पूज्य देवाधिदेव श्री गणेश जी की सर्वत्र अग्रपूजा होती है, वे भी पूजा से पूर्व आपकी पावन धारा में स्नान करके ही पूजन विधि का प्रारंभ करते हैं।

ब्रह्म कमण्डल वासिनी देवी।

श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवी॥

अर्थ: हे देवी! आप सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के कमंडल में वास करने वाली हैं और वैकुंठपति भगवान श्रीहरि विष्णु के चरणकमलों की निरंतर सुखपूर्वक सेवा करने वाली परम शक्ति हैं।

साठि सहस्र सगर सुत तारे।

गंगा सागर तीरथ धारे॥

अर्थ: कपिल मुनि के शाप से भस्म हुए राजा सगर के साठ हजार पुत्रों का आपने केवल अपने पावन स्पर्श से उद्धार किया और जहां आप समुद्र से मिलीं, वह स्थान 'गंगा सागर' महातीर्थ बना।

अगम तरंग उठ्यो मन भावन।

लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन॥

अर्थ: जब आपकी अगम्य और मनोहारी पावन धारा हिमालय की गोद से निकलकर हरिद्वार तीर्थ पहुंची, तो उस दिव्य धाम की छटा देखकर मन आनंद से झूम उठा।

तीरथ राज प्रयाग अक्षैवट।

धरयो मातु पुनि काशी करवट॥

अर्थ: इसके पश्चात आप तीर्थराज प्रयाग और अक्षयवट को पावन करती हुई मोक्षनगरी काशी में पधारीं, जहां आपने अर्धचंद्राकार स्वरूप लेकर काशी करवट का पावन पुण्य फल प्रदान किया।

धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी।

तारणि अमित पितृ पद पीढ़ी॥

अर्थ: हे सुरसरि! आप धन्य हैं, आप साधारण मनुष्यों के लिए स्वर्ग की साक्षात सीढ़ी हैं, जो असंख्य पीढ़ियों के पितरों का उद्धार कर उन्हें मोक्ष पद प्रदान करती हैं।

भागीरथ तप कियो अपारा।

दियो ब्रह्म तब सुरसरि धारा॥

अर्थ: जब इक्ष्वाकु वंश के परम तपस्वी राजा भागीरथ ने घोर तपस्या की, तब प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से आपकी पावन धारा को मुक्त किया।

जब जग जननी चलीं लहराई।

शंभु जटा महं रहीं समाई॥

अर्थ: स्वर्ग से जब आप प्रचंड वेग के साथ हहराती हुई पृथ्वी की ओर बढ़ीं, तब आपके अपार वेग को संभालने के लिए देवाधिदेव भगवान शिव ने आपको अपनी जटाओं में समाहित कर लिया।

वर्ष पर्यन्त गंग महरानी।

रहीं शंभु की जटा भुलानी॥

अर्थ: हे माँ गंगा महारानी! भगवान शिव के असीम वैराग्य और जटा-जाल की सघनता में आप पूरे एक वर्ष तक वहीं रमी और समाई रहीं।

पुनि भागीरथ शंभुहिं ध्यायो।

तब इक बूंद जटा से पायो॥

अर्थ: तब राजा भागीरथ ने पुनः भगवान आशुतोष शिव की स्तुति और ध्यान किया, जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने अपनी जटा से आपकी केवल एक पावन बूंद को पृथ्वी पर प्रवाहित होने दिया।

ताते मातु भईं त्रय धारा।

मृत्यु लोक नभ अरु पातारा॥

अर्थ: उस एक दिव्य बूंद से ही आपकी तीन अलौकिक धाराएं प्रकट हुईं — एक मृत्युलोक (पृथ्वी) पर, दूसरी स्वर्गलोक (आकाश) में और तीसरी पाताललोक में।

गईं पाताल प्रभावति नामा।

मन्दाकिनी गई गगन ललामा॥

अर्थ: पाताल लोक में जाने वाली आपकी पावन धारा 'प्रभावती' कहलाई, आकाश मार्ग में देवताओं को पावन करने वाली धारा 'मंदाकिनी' नाम से प्रसिद्ध हुई।

मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनि।

कलिमल हरणि अगम जग पावनि॥

अर्थ: और इस भूलोक (मृत्युलोक) पर महर्षि जह्नु की कृपा से आप मनभावन 'जाह्नवी' रूप में प्रवाहित हुईं, जो कलियुग के समस्त पापों को हरने वाली और संपूर्ण संसार को पावन करने वाली हैं।

धनि मइया तव महिमा भारी।

धर्म धुरी कलि कलुष कुठारी॥

अर्थ: हे माँ! आप धन्य हैं, आपकी महिमा अनंत और अपार है; आप सत्य और धर्म की धुरी हैं तथा कलियुग के घोर पापों व विकारों को समूल काटने के लिए कुठार (कुल्हाड़ी) के समान हैं।

मातु प्रभावति धनि मन्दाकिनी।

धनि सुरसरित सकल भयनासिनी॥

अर्थ: पाताल में प्रभावती और स्वर्ग में मंदाकिनी रूप में आप धन्य हैं; तथा भूलोक पर समस्त प्रकार के भय और संकटों का नाश करने वाली देवसरिता माँ गंगा! आप सदा वंदनीय हैं।

पान करत निर्मल गंगाजल।

पावत मन इच्छित अनन्त फल॥

अर्थ: आपके निर्मल और औषधीय अमृतमयी गंगाजल का केवल एक घूंट पान कर लेने से भी साधक को अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति और अनंत पुण्यों का फल प्राप्त होता है।

पूरब जन्म पुण्य जब जागत।

तबहिं ध्यान गंगा महं लागत॥

अर्थ: जब मनुष्य के पूर्व जन्मों के संचित पुण्य उदय होते हैं, तभी उसके अंतःकरण में माँ गंगा के दर्शन, स्नान और पावन स्मरण का सच्चा भाव जागृत होता है।

जई पगु सुरसरि हेतु उठावहिं।

तइ जगि अश्वमेध फल पावहिं॥

अर्थ: गंगा स्नान या दर्शन के निमित्त भक्त जैसे ही एक-एक पग आगे बढ़ाता है, उसे प्रत्येक पग पर महायज्ञ अश्वमेध के समान अक्षय पुण्य फल प्राप्त होता है।

महा पतित जिन काहु न तारे।

तिन तारे इक नाम तिहारे॥

अर्थ: संसार के जिन महापापियों और पतित जनों को कोई अन्य साधन या विधि नहीं तार सकी, उन्हें भी केवल आपके एक पावन नाम 'गंगे' के उच्चारण ने भवसागर से पार उतार दिया।

शत योजनहू से जो ध्यावहिं।

निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं॥

अर्थ: जो व्यक्ति सैकड़ों योजन (सैकड़ों मील) दूर बैठकर भी श्रद्धा से माँ गंगा का ध्यान और स्मरण करता है, वह देहत्याग के उपरांत निश्चित रूप से परम पावन वैकुंठ धाम को प्राप्त करता है।

नाम भजत अगणित अघ नाशै।

विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै॥

अर्थ: आपके पावन नाम का जप करने से साधक के अनगिनत पाप भस्म हो जाते हैं और उसके अंतःकरण में निर्मल ज्ञान, आत्मबल और सात्विक बुद्धि का प्रकाश फैलता है।

जिमि धन मूल धर्म अरु दाना।

धर्म मूल गंगाजल पाना॥

अर्थ: जैसे धन का सच्चा सदुपयोग धर्म और सत्पात्र को दान देना है, वैसे ही समस्त धर्म और तपस्याओं का मूल आधार माँ गंगा के पावन जल का श्रद्धापूर्वक आचमन व पान करना है।

तव गुण गुणन करत दुख भाजत।

गृह गृह सम्पत्ति सुमति विराजत॥

अर्थ: आपके दिव्य गुणों का गान और कीर्तन करने से जीवन के समस्त दुःख-दारिद्र्य दूर भाग जाते हैं और घर-घर में सुख-समृद्धि, शांति और सद्बुद्धि का वास होता है।

गंगहि नेम सहित नित ध्यावत।

दुर्जनहूं सज्जन पद पावत॥

अर्थ: जो व्यक्ति नित्य नियमपूर्वक निष्ठा से माँ गंगा का ध्यान और स्मरण करता है, उस पर ऐसी कृपा होती है कि दुर्जन और कुटिल व्यक्ति भी सुधरकर सज्जन पद को प्राप्त हो जाता है।

बुद्धिहीन विद्या बल पावै।

रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै॥

अर्थ: बुद्धिहीन साधक को माँ की कृपा से उत्तम विद्या और विवेक प्राप्त होता है, तथा असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्ति भी रोग-मुक्त होकर दीर्घायु और निरोगी काया पाता है।

गंगा गंगा जो नर कहहीं।

भूखे नंगे कबहूं न रहहीं॥

अर्थ: जो मनुष्य प्रेम और विश्वास के साथ निरंतर 'गंगा-गंगा' नाम का संकीर्तन करते हैं, वे कभी अन्न-वस्त्र के अभाव में नहीं रहते; माँ उनकी समस्त लौकिक आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं।

निकसत ही मुख गंगा माई।

श्रवण दाबि यम चलहिं पराई॥

अर्थ: अंत समय में या जीवन में जिसके मुख से 'गंगा माई' का पावन नाम निकल जाता है, यमराज के दूत भी अपने कान बंद करके भयभीत होकर वहां से पलायन कर जाते हैं।

महा अधिन अधमन कहं तारें।

भए नर्क के बन्द किवारें॥

अर्थ: आप अत्यंत दीन-हीन और पतित जनों को भी भवसागर से पार उतार देती हैं; आपके अनुग्रह से नरक के समस्त द्वार सदा के लिए बंद हो जाते हैं।

जो नर जपै गंग शत नामा।

सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा॥

अर्थ: जो साधक माँ गंगा के पावन शतनाम (सौ दिव्य नामों) का श्रद्धा से जप करता है, उसकी समस्त सिद्धियां और शुभ मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

सब सुख भोग परम पद पावहिं।

आवागमन रहित ह्वै जावहिं॥

अर्थ: वह इस लोक में समस्त धर्मसम्मत सुखों का उपभोग कर अंत में परम धाम को प्राप्त करता है और जन्म-मरण के बंधन (आवागमन) से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

धनि मइया सुरसरि सुखदैनी।

धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी॥

अर्थ: हे समस्त सुखों को प्रदान करने वाली सुरसरि माँ! आप धन्य हैं; तथा गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम से सुशोभित तीर्थराज प्रयाग की त्रिवेणी भी बारंबार धन्य है।

ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा।

सुन्दरदास गंगा कर दासा॥

अर्थ: ऋषि दुर्वासा की तपोभूमि ककरा ग्राम के निवासी, माँ गंगा के अनन्य दास भक्त सुंदरदास जी ने इस पावन चालीसा की रचना की है।

जो यह पढ़ै गंगा चालीसा।

मिलै भक्ति अविरल वागीसा॥

अर्थ: जो भी श्रद्धालु भक्त इस श्री गंगा चालीसा का नित्य पाठ करता है, उसे माँ गंगा की अविरल अनन्य भक्ति और वाणी की देवी माँ सरस्वती का असीम वरदान प्राप्त होता है।

समापन दोहा

नित नव सुख सम्पत्ति लहैं, धरैं गंग का ध्यान।

अन्त समय सुरपुर बसै, सादर बैठि विमान॥

अर्थ: जो मनुष्य नित्य-प्रति माँ गंगा का ध्यान और स्मरण करता है, वह जीवन भर नित्य नवीन सुख-समृद्धि पाता है और अंत समय में आदरपूर्वक दिव्य विमान में बैठकर देवलोक (सुरपुर) में वास करता है।

संवत् भुज नभ दिशि, राम जन्म दिन चैत्र।

पूरण चालीसा कियो, हरि भक्तन हित नैत्र॥

अर्थ: श्रीराम नवमी के पावन चैत्र दिवस पर प्रभुभक्तों के कल्याण और आध्यात्मिक नेत्र (ज्ञान) खोलने के लिए इस चालीसा की रचना पूर्ण की गई।

श्री गंगा चालीसा का महत्व एवं परिचय

सनातन संस्कृति में माँ गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्ममयी चैतन्य धारा, पतित-पावनी करुणामयी माता और मोक्षदायिनी शक्ति हैं। जब संपूर्ण चराचर जगत में पाप, ताप और संताप की ज्वाला धधकती है, तब उस दावानल को शांत करने के लिए अमृतमयी गंगा की शीतल धारा ही एकमात्र आश्रय बनती है। ब्रह्मा जी के कमंडल से प्रकट होकर, भगवान श्रीहरि विष्णु के वामन अवतार में उनके चरणकमल का प्रक्षालन कर, और फिर देवाधिदेव महादेव शिव की सघन जटाओं में समाहित होकर भूलोक पर अवतरित होने वाली माँ गंगा त्रिदेवों की संयुक्त कृपा का प्रत्यक्ष स्वरूप हैं।

महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों के भस्म हो जाने पर, उनके उद्धार हेतु इक्ष्वाकु वंशीय राजा भगीरथ ने पीढ़ियों की घोर तपस्या की। भगीरथ के इस अदम्य संकल्प के कारण ही माँ गंगा स्वर्ग से भूतल पर अवतरित हुईं और ‘भागीरथी’ कहलाईं। पृथ्वी पर उनके प्रचंड वेग से जब महर्षि जह्नु का यज्ञमंडप बह गया, तो उन्होंने क्रोधित होकर गंगा का पान कर लिया; फिर देवताओं की प्रार्थना पर उन्हें अपनी जंघा या कान से पुनः मुक्त किया, जिससे वे ‘जाह्नवी’ नाम से प्रसिद्ध हुईं।

श्री गंगा चालीसा भक्त कवि सुंदरदास जी द्वारा विरचित एक ऐसा पावन स्तोत्र है, जो माँ गंगा के स्वर्गारोहण, शिव-जटा में प्रवेश, त्रिपथगा (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) स्वरूप और उनके नाम-स्मरण के अनन्त महात्म्य को बड़ी ही सरल और रसमय अवधी भाषा में प्रस्तुत करता है। इस चालीसा का नित्य पाठ करने वाले साधक के मन से पाप-बोध समाप्त होता है, अंतःकरण निर्मल बनता है और जीवन में सात्विक शांति का संचार होता है।

श्री गंगा चालीसा पाठ करने की सही विधि एवं नियम

माँ गंगा परम दयामयी और सहज कृपा करने वाली माता हैं। उनका पाठ अत्यंत सरल और पवित्र भाव से किया जाना चाहिए:

  1. पवित्र स्नान एवं शुचिता: प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त हों। यदि गंगा तट पर उपस्थित हों तो गंगा में तीन डुबकी लगाकर वहीं तट पर पाठ करें। यदि घर पर हों, तो साधारण जल में कुछ बूंद गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  2. आसन एवं दिशा: स्वच्छ श्वेत अथवा पीले वस्त्र धारण करें। उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
  3. गंगाजल की स्थापना: पूजा की चौकी पर माँ गंगा का चित्र स्थापित करें और तांबे अथवा पीतल के पात्र में शुद्ध जल व थोड़ा गंगाजल भरकर सामने रखें। उसमें अक्षत और श्वेत पुष्प अर्पित करें।
  4. दीप एवं नैवेद्य: गाय के शुद्ध घी का दीपक और सुगंधित धूप प्रज्वलित करें। माँ गंगा को सफेद पुष्प (कमल, चमेली या गेंदा), सफेद चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य में बताशा, खीर या सफेद मिष्ठान्न व मौसमी फल अर्पित करें।
  5. एकाग्र पाठ: दोनों हाथ जोड़कर पहले माँ गंगा का ध्यान करें। इसके उपरांत शांत, स्पष्ट और मधुर स्वर में दोहे, 40 चौपाइयों और समापन दोहों का पाठ करें।
  6. आचमन एवं छिड़काव: पाठ संपन्न होने पर ‘ॐ नमो भगवत्यै गंगायै नारायण्यै नमो नमः’ का 11 बार जप करें। इसके बाद पूजा में रखे गंगाजल से स्वयं व परिवार के सदस्यों को आचमन कराएं और उस पावन जल को पूरे घर में छिड़कें।

श्री गंगा चालीसा पाठ के अद्भुत लाभ एवं महत्व

श्री गंगा चालीसा का प्रतिदिन अथवा विशेष पर्वों पर नियमपूर्वक पाठ करने से साधक को जीवन में निम्नलिखित प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होते हैं:

  • त्रिताप और समस्त पापों का समूल नाश: “जग पावनि त्रय ताप नसावनि, तरल तरंग तुंग मन भावनि” — मनुष्य के जाने-अनजाने किए गए कायिक, वाचिक और मानसिक पाप माँ गंगा के स्मरण मात्र से भस्म हो जाते हैं और तीनों ताप (दैहिक, दैविक, भौतिक) शांत होते हैं।
  • असाध्य रोगों से मुक्ति एवं दीर्घायु: “बुद्धिहीन विद्या बल पावै, रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै” — गंगाजल और गंगा चालीसा का पाठ शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता और मानसिक आत्मबल को बढ़ाकर असाध्य व्याधियों से रक्षा करता है।
  • अन्न-वस्त्र और दरिद्रता का अभाव नहीं: “गंगा गंगा जो नर कहहीं, भूखे नंगे कबहूं न रहहीं” — जो भक्त निरंतर गंगा नाम का संकीर्तन करते हैं, उनके घर में कभी अन्न, धन और वस्त्र का अभाव नहीं होता; माँ अन्नपूर्णा की भांति उनका भरण-पोषण करती हैं।
  • यम-भय और अकाल मृत्यु से सुरक्षा: “निकसत ही मुख गंगा माई, श्रवण दाबि यम चलहिं पराई” — माँ गंगा का नाम अंतःकरण में अभय की ज्योति जलाता है, जिससे साधक को दुःस्वप्न, अकाल मृत्यु और यमदूतों का कोई भय नहीं रहता।
  • पितृ दोष शांति और पूर्वजों की सद्गति: “धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी, तारणि अमित पितृ पद पीढ़ी” — यदि कुंडली में पितृ दोष हो या पूर्वज अशांत हों, तो गंगा चालीसा का पाठ उनके उद्धार का साक्षात माध्यम बनता है।
  • सद्बुद्धि और वाणी सिद्धि: “जो यह पढ़ै गंगा चालीसा, मिलै भक्ति अविरल वागीसा” — विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों को माँ सरस्वती की कृपा से तीव्र बुद्धि, एकाग्रता और वाणी में ओज प्राप्त होता है।

माँ गंगा एवं अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

माँ गंगा भगवान शिव की जटाओं और भगवान श्रीहरि विष्णु के चरणकमलों से संबद्ध हैं। उनकी पूर्ण कृपा प्राप्ति हेतु इनके संबंधित पावन पाठ भी अवश्य पढ़ें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.श्री गंगा चालीसा का पाठ किस समय और किस प्रकार करना सर्वाधिक फलदायी होता है?

गंगा चालीसा का पाठ प्रातःकाल स्नान के पश्चात ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय के समय करना सर्वोत्तम माना गया है। यदि घर पर पाठ कर रहे हों तो एक तांबे के पात्र में थोड़ा गंगाजल मिलाकर सामने रखें और पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। पाठ के उपरांत उस पावन गंगाजल से आचमन करें और पूरे घर में उसका छिड़काव करें, जिससे घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।

प्र.क्या गंगा नदी से दूर रहने पर भी घर पर गंगा चालीसा का पाठ करने से वही पुण्य मिलता है?

हाँ, चालीसा में स्पष्ट वर्णित है — 'शत योजनहू से जो ध्यावहिं, निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं'। स्कंद पुराण के अनुसार यदि कोई व्यक्ति सैकड़ों मील दूर रहकर भी शुद्ध मन से 'ॐ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति...' मंत्र अथवा गंगा चालीसा का पाठ करता है, तो माँ गंगा सूक्ष्म रूप से उसके जलपात्र में अवतरित होकर साक्षात गंगा स्नान के समान अक्षय पुण्य प्रदान करती हैं।

प्र.गंगा चालीसा का पाठ किन विशेष तिथियों या पर्वों पर अवश्य करना चाहिए?

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को पड़ने वाला 'गंगा दशहरा' (माँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण दिवस) और वैशाख शुक्ल सप्तमी (गंगा सप्तमी / गंगा जयंती) इस पाठ के लिए सबसे फलदायी पर्व हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मास की पूर्णिमा, अमावस्या, मकर संक्रांति, ग्रहण काल और पितृ पक्ष में गंगा चालीसा का पाठ करने से पितरों को मोक्ष और कुल को शांति प्राप्त होती है।

प्र.गंगा चालीसा के नियमित पाठ से कौन-से मुख्य लाभ प्राप्त होते हैं?

चालीसा की चौपाई कहती है — 'बुद्धिहीन विद्या बल पावै, रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै'। नियमित पाठ से मानसिक तनाव व अज्ञात भय दूर होता है, गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है, घर में अन्न-धन की कभी कमी नहीं होती और अंत समय में यमदूतों का भय समाप्त होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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