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विष्णु आरती (Vishnu Aarti — पावन आरती पद सरल हिंदी भावार्थ सहित)
विष्णु आरती— अर्थ, लाभ एवं आरती विधि सहित
Vishnu Aarti
जगत के पालनकर्ता, करुणामय भगवान श्री विष्णु एवं सत्यनारायण स्वामी की यह परम पावन आरती भक्तों के समस्त पाप, संताप, दरिद्रता और संकटों का तत्क्षण निवारण करती है।
विष्णु आरती संपूर्ण पाठ
पावन आरती पद सरल हिंदी भावार्थ सहित
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...॥
अर्थ: हे माता महालक्ष्मी के हृदय-वल्लभ, क्षीरसागर-निवासी प्रभु! आपकी सदा ही जय हो। हे समस्त जगत के आधार, सत्यस्वरूप भगवान श्री सत्यनारायण स्वामी! आप अपनी शरण में आए समस्त दीन-दुखियों और भक्तों के पापों, संतापों तथा अज्ञान का समूल नाश करने वाले हैं। हे करुणामय श्रीहरि, आपकी बारंबार जय हो।
रतन जड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजै।
नारद करत निरंतर, घंटा ध्वनि बाजै॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...॥
अर्थ: हे प्रभु! आप बहुमूल्य मणियों और दिव्य रत्नों से जड़े भव्य सुवर्ण सिंहासन पर विराजमान हैं, जहाँ आपका चतुर्भुज दिव्य श्याम रूप अनुपम छटा बिखेर रहा है। देवर्षि नारद जी वीणा की मधुर झंकार के साथ निरंतर आपका गुणगान कर रहे हैं और मंदिर में मंगलगान के साथ मधुर घंटा-ध्वनि गूंज रही है।
प्रकट भए कलि कारण, द्विज को दरश दियो।
बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...॥
अर्थ: कलियुग में भटके हुए जीवों के उद्धार हेतु आपने अत्यंत दयालु होकर एक वृद्ध ब्राह्मण (संन्यासी) का रूप धरा और दरिद्र विप्र को साक्षात दर्शन दिए। आपने उन्हें सत्यनारायण व्रत का मार्ग दिखाकर उनकी घोर दरिद्रता मिटाई और उनकी झोपड़ी को स्वर्ण-महल (कंचन महल) में परिवर्तित कर दिया।
दुर्बल भील कठौता, जिन पर कृपा करी।
चंद्रचूड़ एक राजा, जिनकी विपत्ति हरी॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...॥
अर्थ: हे भक्तवत्सल दीनानाथ! आपने लकड़ी बेचने वाले अत्यंत निर्धन और दुर्बल भील (सत्यव्रत) पर अपनी अहैतुकी कृपा बरसाई और उसे अखंड सुख व मोक्ष दिया। वहीं महाराज चंद्रचूड़ ने जब आपकी शरण ली, तो आपने उनके राज्य के समस्त संकट, शत्रु-भय और विपत्तियों का क्षण भर में हरण कर लिया।
वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीनी।
सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कीनी॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...॥
अर्थ: साधु नामक वैश्य ने आपके आशीर्वाद से संतान और व्यापार का मनोरथ पाया, परंतु अहंकारवश व्रत की श्रद्धा भुला दी। जब उसने अपने कर्मों का कष्टप्रद फल पाया और कारागार में पड़ा, तब उसने पश्चाताप कर हाथ जोड़कर आपकी स्तुति की और आपने पुनः उसका उद्धार कर धन-धान्य लौटाया।
भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धरयो।
श्रद्धा धारण कीनी, तिनको काज सरयो॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...॥
अर्थ: हे प्रभु! आप किसी बाह्य आडंबर के भूखे नहीं, केवल शुद्ध भाव और सच्ची प्रीति के वश में हैं। अपने भक्तों की परीक्षा लेने और उन पर कृपा करने के लिए आप प्रतिक्षण नूतन लीला-रूप धरते हैं। जिस भी भक्त ने निष्कपट श्रद्धा से आपका स्मरण किया, उसके सारे बिगड़े कार्य आपने सहज ही सिद्ध कर दिए।
ग्वाल बाल संग राजा, वन में भक्ति करी।
मनवांछित फल दीन्हो, दीनदयालु हरी॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...॥
अर्थ: हे अनाथों के नाथ! वन में जब ग्वाल-बालों ने निष्पाप भाव से आपका पूजन किया और राजा तुंगध्वज ने भी बाद में अपनी भूल सुधारकर उन बालकों के साथ आपका प्रसाद ग्रहण किया, तो आपने उन सभी को मनवांछित फल, राज्य-वैभव और अंत में अपना परम धाम प्रदान किया।
चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा।
धूप दीप तुलसी से, राजी सत्यदेवा॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...॥
अर्थ: आपके पूजन में गेहूं के आटे की सवाई पंजीरी (पंजीरी प्रसाद), केला (कदली फल), पंचामृत, मेवा और मिष्ठान्न अर्पित किए जाते हैं। सुगंधित धूप, दीप, कर्पूर और विशेषकर पावन तुलसीदल के अर्पण मात्र से सत्य के अधिष्ठाता प्रभु श्री सत्यनारायण तत्काल प्रसन्न होकर वरदान देते हैं।
श्री सत्यनारायण जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा॥
ॐ जय लक्ष्मी रमणा...॥
अर्थ: स्वामी शिवानंद जी कहते हैं कि जो भी श्रद्धालु नर-नारी पूर्ण श्रद्धा, एकाग्र चित्त और भक्ति-भाव से भगवान श्री सत्यनारायण (विष्णु) की इस पावन आरती का नित्य या पूर्णिमा पर गान करता है, वह इस लोक में समस्त सुख-सौभाग्य भोगकर अंत में प्रभु के परम पद को प्राप्त करता है।
श्री विष्णु आरती (जय लक्ष्मी रमणा) का महत्व एवं परिचय
सनातन धर्म में देवाधिदेव भगवान श्री विष्णु संपूर्ण ब्रह्मांड के पालनकर्ता और करुणा के असीम सागर हैं। जब-जब पृथ्वी पर धर्म की ग्लानि होती है और भक्त संकट में पड़ते हैं, तब-तब श्रीहरि अपने भक्तों की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए विभिन्न पावन अवतार धारण करते हैं। भगवान विष्णु की यह प्रसिद्ध आरती ‘ॐ जय लक्ष्मी रमणा’ विशेष रूप से भगवान श्री सत्यनारायण स्वामी की पूजा, सत्यनारायण व्रत कथा, गुरुवार की दैनिक आराधना और हर मास की पूर्णिमा व एकादशी पर गाई जाती है।
इस आरती के प्रत्येक पद में भगवान श्री सत्यनारायण की पावन कथा की दिव्य लीलाओं का अत्यंत सुंदर और गेय वर्णन पिरोया गया है। इसमें उस निर्धन ब्राह्मण की कथा है जिसकी दरिद्रता प्रभु ने वृद्ध ब्राह्मण बनकर कंचन महल में बदल दी; उस निष्कपट लकड़हारे भील की कथा है जिस पर प्रभु ने अपनी अहैतुकी कृपा की; और साधु वैश्य तथा राजा चंद्रचूड़ के उद्धार का प्रसंग है। यह आरती हमें स्मरण कराती है कि ईश्वर केवल धन या वैभव से नहीं, बल्कि निर्मल हृदय और अटूट श्रद्धा से रीझते हैं।
जब संध्याकाल या नित्य पूजा में शंख की मांगलिक ध्वनि और घंटी की ताल पर इस आरती का संकीर्तन होता है, तो घर का संपूर्ण वातावरण सकारात्मक ऊर्जा, आध्यात्मिक शांति और सात्विकता से भर उठता है। माता महालक्ष्मी अपने स्वामी श्रीहरि के साथ उस गृह में चिरकाल तक निवास करती हैं।
भगवान विष्णु की आरती करने की सही विधि एवं नियम
भगवान विष्णु अत्यंत दयालु और आशु-प्रसन्न होने वाले देव हैं, किंतु उनकी पूजा और आरती में शुद्धता, सात्विकता और नियमों का पालन करना विशेष फलदायी माना जाता है:
- शुभ दिन एवं समय: विष्णु आरती का गान नित्य प्रातः और संध्या आरती के समय किया जा सकता है। विशेष रूप से गुरुवार (बृहस्पतिवार), एकादशी तिथि, पूर्णिमा, सत्यनारायण कथा के समापन पर और वैकुंठ एकादशी के दिन यह आरती करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
- दिशा एवं आसन: आरती करते समय साधक का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। स्वयं स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें और कुश अथवा ऊन के पवित्र आसन पर खड़े हों।
- दीपक एवं थाल की तैयारी: पीतल, तांबे या चांदी की थाली में कुंकुम से स्वास्तिक बनाएं। आरती के लिए गाय के शुद्ध घी का पंचमुखी दीपक अथवा शुद्ध कर्पूर का उपयोग करें। थाली में पीले पुष्प, अक्षत और तुलसीदल अवश्य रखें।
- तुलसीदल का अनिवार्य नियम: भगवान विष्णु की पूजा और आरती तुलसीदल के बिना अधूरी मानी जाती है। नैवेद्य में सवाया पंजीरी (भुने गेहूं के आटे में घी व चीनी), पंचामृत और केले (कदली फल) पर तुलसी का पत्ता रखकर ही भोग लगाएं।
- आरती घुमाने की शास्त्रीय विधि: आरती के दीपक को भगवान की प्रतिमा के सम्मुख इस क्रम में घुमाएं:
- चार (४) बार भगवान के श्रीचरणों में,
- दो (२) बार नाभि-कमल पर,
- एक (१) बार प्रभु के मुखारविंद पर,
- और सात (७) बार भगवान के संपूर्ण दिव्य विग्रह के चारों ओर घड़ी की सुई की दिशा (clockwise) में घुमाएं।
- आरती के उपरांत मंत्र: आरती समाप्त होने के उपरांत कर्पूरगौरं मंत्र बोलें, तीन बार आचमन जल घुमाएं और दोनों हाथों से आरती की पावन ज्योति को अपने मस्तक और नेत्रों से लगाएं।
श्री विष्णु आरती पाठ के अद्भुत लाभ एवं फलश्रुति
श्री सत्यनारायण एवं भगवान विष्णु की इस पावन आरती का नित्य श्रद्धापूर्वक गान करने से साधक के जीवन में चमत्कारी आध्यात्मिक और भौतिक बदलाव आते हैं:
- समस्त पापों और क्लेशों का शमन: आरती की टेक में ही कहा गया है — “सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा”। सच्चे हृदय से क्षमा-प्रार्थना करते हुए आरती करने से जन्म-जन्मांतर के संचित पाप, अज्ञान और मानसिक संताप नष्ट हो जाते हैं।
- दरिद्रता का नाश एवं कंचन समृद्धि: जिस प्रकार प्रभु ने वृद्ध विप्र पर कृपा कर “बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो”, उसी प्रकार जो भक्त नियमित इस आरती का संकीर्तन करते हैं, उनके घर से दरिद्रता, कर्ज और आर्थिक तंगी का समूल नाश होकर अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
- घोर संकटों और विपत्तियों से रक्षा: आरती का पद स्मरण कराता है — “चंद्रचूड़ एक राजा, जिनकी विपत्ति हरी”। जीवन में आए असाध्य रोग, अदालती विवाद, शत्रु-बाधा अथवा अचानक आए संकटों से श्रीहरि तत्काल रक्षा करते हैं।
- अहंकार की मुक्ति और व्यापार-वृद्धि: साधु वैश्य के प्रसंग “सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कीनी” से शिक्षा मिलती है कि जो साधक अपनी समृद्धि में प्रभु का आभार मानते हैं, उनका व्यापार, मान-सम्मान और वंश निरंतर फलता-फूलता है।
- सर्वमनोकामना सिद्धि और मोक्ष: समापन फलश्रुति में स्पष्ट है — “कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे”। निष्काम भाव से आरती गाने वाले को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सहज प्राप्ति होती है।
भगवान विष्णु के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)
श्रीहरि विष्णु की पूर्ण कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए चालीसा सागर पर उपलब्ध इन अन्य पावन पाठों का भी नित्य श्रवण व पठन करें:
- श्री ॐ जय जगदीश हरे (Om Jai Jagdish Hare Aarti) — पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी विरचित जगत-प्रसिद्ध विष्णु वंदना।
- श्री महालक्ष्म्यष्टकम् (Mahalakshmi Ashtakam) — देवराज इंद्र कृत माता लक्ष्मी का अमोघ अष्टकम श्लोक पाठ।
- श्री राम चालीसा (Ram Chalisa in Hindi) — मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के चालीस पावन दोहे व चौपाइयां।
- श्री कृष्ण चालीसा (Krishna Chalisa in Hindi) — पूर्णावतार भगवान श्री कृष्ण की दिव्य बाल व युवा लीलाओं का पाठ।
- श्री द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र (Dwadash Jyotirlinga Stotram) — देवाधिदेव महादेव के बारह ज्योतिर्लिंगों का पावन स्तुति पाठ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्र.विष्णु आरती (जय लक्ष्मी रमणा) का पाठ कब और किस दिन करना चाहिए?
श्री विष्णु आरती का पाठ दैनिक पूजा में प्रातः और संध्या दोनों समय किया जा सकता है। विशेष रूप से गुरुवार, हर माह की एकादशी तिथि, पूर्णिमा (सत्यनारायण व्रत) तथा वैकुंठ एकादशी के पावन अवसर पर इस आरती का गायन अनंत गुना पुण्यफल प्रदान करता है।
प्र.भगवान विष्णु की आरती में किन सामग्रियों का होना अनिवार्य माना गया है?
भगवान विष्णु की पूजा और आरती में गाय के शुद्ध घी का दीपक या कर्पूर, शंख, घंटी, पीले पुष्प, तुलसीदल, पंचामृत तथा सवाया पंजीरी और केले (कदली फल) का नैवेद्य अत्यंत प्रिय और अनिवार्य माना गया है। बिना तुलसीदल के श्रीहरि का भोग अधूरा माना जाता है।
प्र.श्री विष्णु आरती 'जय लक्ष्मी रमणा' की रचना किसने की है?
आरती की फलश्रुति पंक्ति 'कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे' के अनुसार इस दिव्य आरती के रचयिता स्वामी शिवानंद जी माने जाते हैं। यह आरती सदियों से सनातन परंपरा में श्री सत्यनारायण भगवान की कथा और श्रीहरि विष्णु की नित्य आराधना में गाई जाती रही है।
प्र.विष्णु आरती का नियमित गायन करने से साधक को क्या लाभ मिलते हैं?
आरती के शब्दों के अनुसार इसका भावपूर्ण गायन साधक के जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय करता है ('जन पातक हरणा')। घर में माता लक्ष्मी का स्थायी वास होता है, दरिद्रता और गृह-क्लेश मिटते हैं तथा जीवन के अंत में श्रीहरि के परम धाम वैकुंठ की प्राप्ति होती है।
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