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गणेश आरती

सुखकर्ता दुखहर्ता— अर्थ, लाभ एवं आरती विधि सहित

Sukhkarta Dukhharta

समर्थ रामदास स्वामी विरचित भगवान श्री गणेश की यह पावन आरती (सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची) विघ्नों के नाश, कार्य सिद्धि और जीवन में सुख-समृद्धि के विस्तार हेतु गाई जाती है।

समर्थ रामदास स्वामी५ मिनट पाठ

सुखकर्ता दुखहर्ता संपूर्ण पाठ

पावन आरती पद सरल हिंदी भावार्थ सहित

टेक

जय देव, जय देव, जय मंगलमूर्ती ।

दर्शनमात्रे मनकामना पुरती, जय देव जय देव ॥

अर्थ: हे देव! हे मंगलमूर्ति श्री गणेश! आपकी जय हो, जय हो। आपके केवल दर्शन मात्र से ही भक्तों की समस्त मनोकामनाएं और मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।

पद १

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची ।

नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची ॥

सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची ।

कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ॥

जय देव, जय देव, जय मंगलमूर्ती ।

दर्शनमात्रे मनकामना पुरती, जय देव जय देव ॥

अर्थ: आप समस्त सुखों को प्रदान करने वाले और समस्त दुखों को हरने वाले हैं। आप जीवन से विघ्नों और संकटों की वार्ता (नामोनिशान) तक मिटा देते हैं। आपकी असीम कृपा भक्तों के हृदय में केवल अनन्य प्रेम का संचार करती है। आपके संपूर्ण पावन अंगों पर सिंदूर (शेंदूर) का सुंदर लेप सुशोभित है और आपके गले में मोतियों की दिव्य माला जगमगा रही है। हे मंगलमूर्ति, आपकी सदा जय हो।

पद २

रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा ।

चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा ॥

हिरेजड़ित मुकुट शोभतो बरा ।

रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरीया ॥

जय देव, जय देव, जय मंगलमूर्ती ।

दर्शनमात्रे मनकामना पुरती, जय देव जय देव ॥

अर्थ: हे माता पार्वती के नंदन (गौरीसुत)! आप रत्नों से जड़े दिव्य आभूषणों को धारण किए हुए हैं। आपके पावन विग्रह पर शीतल चंदन, कुमकुम और केसर का सुगंधित लेप लगा हुआ है। आपके मस्तक पर हीरों से जड़ा मुकुट अत्यंत शोभायमान हो रहा है और आपके श्रीचरणों में बंधी नूपुर तथा घुंघरू रुनझुन की मधुर ध्वनि कर रहे हैं। हे मंगलमूर्ति प्रभु, आपकी सदा जय हो।

पद ३

लंबोदर पीतांबर फणीवर बंधना ।

सरळ सोंड वक्रतुण्ड त्रिनयना ॥

दास रामाचा वाट पाहे सदना ।

संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे, सुरवरवंदना ॥

जय देव, जय देव, जय मंगलमूर्ती ।

दर्शनमात्रे मनकामना पुरती, जय देव जय देव ॥

अर्थ: हे लंबोदर प्रभु! आप पीतांबर वस्त्र धारण करने वाले और नागराज को आभूषण रूप में धारण करने वाले हैं। आपकी सरल और वक्र (मुड़ी हुई) सूंड है तथा आप त्रिनेत्रधारी हैं। प्रभु श्रीराम के दास (समर्थ रामदास स्वामी अथवा शरणागत भक्त) अपने गृह-द्वार पर आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हे देवताओं द्वारा पूजित भगवान! हर विपत्ति में हमारी रक्षा करें और अंत समय में भवसागर से पार उतारें। हे मंगलमूर्ति, आपकी सदा जय हो।

श्री सुखकर्ता दुखहर्ता आरती का महत्व एवं परिचय

सनातन धर्म में प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश समस्त मंगलों के मूल और विघ्नों के संहारक हैं। जब भी जीवन में कोई नया संकल्प लिया जाता है, किसी नए कार्य का शुभारंभ होता है या किसी कठिन बाधा का सामना करना पड़ता है, तो गणेश जी का स्मरण अंतःकरण में निर्भयता और नवचेतना का संचार करता है। गजानन की आराधना से न केवल बुद्धि और विवेक की वृद्धि होती है, बल्कि घर-परिवार में रिद्धि-सिद्धि और स्थायी सुख-शांति का वास होता है।

‘सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची’ भगवान गणेश की सर्वाधिक लोकप्रिय और ऊर्जावान आरतियों में से एक है। इसकी रचना १७वीं शताब्दी के महान संत और छत्रपति शिवाजी महाराज के आध्यात्मिक गुरु समर्थ रामदास स्वामी जी ने की थी। लोक मान्यता के अनुसार, समर्थ रामदास जी ने अष्टविनायक के प्रथम तीर्थ मयूरेश्वर (मोरगांव) के पावन गणेश मंदिर में भावविभोर होकर इस अमर स्तुति की रचना की थी।

यद्यपि यह आरती मूलतः महाराष्ट्रीय भक्ति परंपरा से उपजी है, किंतु इसकी सरल शब्दावली, लयबद्धता और भक्तिरस ने इसे पूरे देश के सनातन परिवारों का अभिन्न अंग बना दिया है। विशेष रूप से भाद्रपद मास के गणेशोत्सव में जब घर-घर और विशाल पंडालों में करताल, झांझ और शंख की ध्वनि के साथ ‘जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती’ की गूंज उठती है, तो संपूर्ण वातावरण दिव्यता और आनंद से सराबोर हो उठता है।

श्री सुखकर्ता दुखहर्ता आरती गान करने की सही विधि एवं नियम

भगवान श्री गणेश की आरती अत्यंत सहज और भावप्रधान है। आरती करते समय निम्नलिखित शास्त्रीय एवं पारंपरिक नियमों का पालन करें:

  1. पवित्रता एवं शुभ समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय अथवा सायंकाल गोधूलि वेला में स्नान आदि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र (पीले या लाल वस्त्र विशेष उत्तम) धारण करें। बुधवार, संकष्टी चतुर्थी तथा विनायक चतुर्थी पर यह आरती विशेष रूप से फलदायी है।
  2. आरती की थाली की सज्जा: पीतल, तांबे या चांदी की थाली में शुद्ध गाय के घी का दीपक अथवा सुगंधित भीमसेनी कर्पूर सजाएं। साथ में रोली, चंदन, अक्षत, सुगंधित लाल पुष्प और गणेश जी को अत्यंत प्रिय दूर्वा (दूब घास) अवश्य रखें।
  3. तुलसी दल का निषेध: यह शास्त्रीय नियम सदैव स्मरण रखें कि भगवान गणेश की पूजा, भोग अथवा आरती में कभी भी तुलसी पत्र का प्रयोग नहीं किया जाता।
  4. आरती की थाली घुमाने का क्रम: आरती की थाली को भगवान गणेश के चरणों में चार बार, नाभि मंडल के सामने दो बार, मुखारविंद के सम्मुख एक बार तथा संपूर्ण दिव्य विग्रह के समक्ष सात बार घड़ी की सुई की दिशा (Clockwise) में ॐ की आकृति बनाते हुए घुमाएं।
  5. भोग एवं समर्पण: आरती संपन्न होने पर मोदक, मोतीचूर के लड्डू अथवा मौसमी फल का भोग लगाएं। इसके पश्चात दोनों हाथों से आरती की पावन लौ को शीश पर धारण करें और सभी भक्तों में प्रसाद वितरित करें।

श्री सुखकर्ता दुखहर्ता आरती के अद्भुत लाभ एवं महत्व

श्री सुखकर्ता दुखहर्ता आरती का नित्य भावपूर्ण गान करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • समस्त विघ्नों और संकटों का समूल नाश: “सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची” — भगवान गजानन की कृपा से जीवन की कठिन से कठिन रुकावटें, पारिवारिक क्लेश और व्यावसायिक बाधाएं समाप्त हो जाती हैं और विघ्नों का नामोनिशान भी नहीं रहता।
  • असीम ईश्वरीय प्रेम और कृपा की प्राप्ति: “नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची” — नित्य आरती गान करने से साधक के हृदय में प्रभु के प्रति अनन्य भक्ति और निष्काम प्रेम का प्राकट्य होता है, जिससे मन शांत और तनावमुक्त रहता है।
  • मनोकामनाओं और सात्विक संकल्पों की सिद्धि: “दर्शनमात्रे मनकामना पुरती” — श्रद्धा और एकाग्रता से आरती करने पर केवल मंगलमूर्ति के मानसिक दर्शन मात्र से ही जीवन के सभी शुभ संकल्प और अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होते हैं।
  • विपत्तियों में अभय और मोक्ष की प्राप्ति: “संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे” — भगवान गणेश हर विपत्ति में अपने भक्त की ढाल बनकर रक्षा करते हैं और अंत समय में भवसागर से पार उतारकर परम पद प्रदान करते हैं।
  • बुद्धि, विवेक और गृह समृद्धि का वास: “रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा” — माता पार्वती के लाड़ले गौरीसुत की नित्य स्तुति से घर में दरिद्रता का नाश होता है तथा विद्या, बुद्धि और रिद्धि-सिद्धि का स्थायी वास होता है।

भगवान गणेश के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)

प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश की संपूर्ण कृपा प्राप्त करने हेतु इन पवित्र पाठों का भी नित्य पाठ करें:

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र.सुखकर्ता दुखहर्ता आरती के रचयिता कौन हैं और इसका मूल स्त्रोत क्या है?

श्री सुखकर्ता दुखहर्ता आरती की रचना १७वीं शताब्दी के महान संत समर्थ रामदास स्वामी जी ने महाराष्ट्र के मयूरेश्वर (मोरगांव) गणेश मंदिर में की थी। यह पावन आरती मूल रूप से सरल मराठी-प्राकृत में रचित है, किंतु अपनी असीम दिव्यता और लोकप्रियता के कारण पूरे भारतवर्ष में हर घर और गणेशोत्सव में बड़े भाव से गाई जाती है।

प्र.सुखकर्ता दुखहर्ता आरती और 'जय गणेश देवा' आरती में क्या अंतर है?

दोनों ही आरतियां भगवान गणेश को समर्पित हैं, किंतु 'जय गणेश देवा' विशुद्ध हिंदी (ब्रज/खड़ी बोली) परंपरा की आरती है, जबकि 'सुखकर्ता दुखहर्ता' समर्थ रामदास जी द्वारा रचित पारंपरिक आरती है। गणेशोत्सव (गणेश चतुर्थी) के पावन अवसर पर और नित्य पूजा में इन दोनों आरतियों का गायन अत्यंत मंगलकारी माना जाता है।

प्र.आरती की पावन पंक्ति 'संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे' का क्या अर्थ है?

इस पावन पंक्ति में भक्त भगवान गजानन से प्रार्थना करता है कि 'हे विघ्नहर्ता! जीवन के संकट के समय आप तुरंत हमारी सहायता के लिए पधारें (संकटी पावावे) और हमारे अंतिम समय या मोक्ष की बेला में हमारी रक्षा कर भवसागर से पार लगाएं (निर्वाणी रक्षावे)।' यह पंक्ति भगवान गणेश के संकटमोचक और मोक्षदाता स्वरूप को दर्शाती है।

प्र.सुखकर्ता दुखहर्ता आरती का पाठ करने की सही विधि और समय क्या है?

इस आरती का गान प्रातःकाल पूजा के समय और सायंकाल गोधूलि वेला में कपूर या शुद्ध घी का दीपक जलाकर करना चाहिए। आरती करते समय थाली को भगवान गणेश के विग्रह के सम्मुख घड़ी की दिशा (Clockwise) में घुमाएं और मोदक, दूर्वा तथा लाल पुष्प अर्पित करें। बुधवार और चतुर्थी तिथि पर इसका गान विशेष रूप से कार्यसिद्धि प्रदाता है।

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