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बजरंग बाण (Bajrang Baan — पावन श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित)
बजरंग बाण— अर्थ, लाभ एवं पाठ विधि सहित
Bajrang Baan
गोस्वामी तुलसीदास जी विरचित श्री बजरंग बाण समस्त प्रकार के घोर संकटों, भय, शत्रु बाधा, नकारात्मक ऊर्जा और असाध्य व्याधियों का तत्काल निवारण करने वाला अचूक एवं अमोघ रक्षा-स्तोत्र है।
बजरंग बाण संपूर्ण पाठ
पावन श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान ।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान ॥
अर्थ: जो भी भक्त पूर्ण दृढ़ता, निष्कपट प्रेम और अटूट विश्वास के साथ आदरपूर्वक श्री हनुमान जी की विनय (प्रार्थना) करता है, पवनपुत्र हनुमान जी उसके सभी शुभ और मंगलकारी कार्यों को निश्चित रूप से सिद्ध (पूर्ण) करते हैं।
जय हनुमंत संत हितकारी ।
सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी ॥
अर्थ: हे संतों और सज्जनों का सदा कल्याण करने वाले कृपालु श्री हनुमान जी, आपकी सदा जय हो! हे प्रभु! कृपा करके अब मेरी इस दीन प्रार्थना को सुन लीजिए।
जन के काज बिलंब न कीजै ।
आतुर दौरि महा सुख दीजै ॥
अर्थ: हे महावीर! अपने इस शरणागत सेवक के कार्य को सिद्ध करने में तनिक भी विलंब न कीजिए। आप शीघ्रता से दौड़कर आइए और घोर संकट हरकर परम सुख प्रदान कीजिए।
जैसे कूदि सिंधु महि पारा ।
सुरसा बदन पैठि बिस्तारा ॥
अर्थ: जिस प्रकार आपने विशाल समुद्र को एक ही छलांग में लांघ लिया था और रास्ते में सुरसा के विकराल मुख में चतुराई से प्रवेश करके उसके विस्तार को निष्प्रभावी कर दिया था—
आगे जाय लंकिनी रोका ।
मारेहु लात गई सुरलोका ॥
अर्थ: आगे बढ़कर जब लंका के द्वार पर लंकिनी राक्षसी ने आपका मार्ग रोका, तब आपने एक ही प्रहार से उसे परास्त कर दिया और वह भयभीत होकर देवलोक को सिधार गई।
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा ।
सीता निरखि परमपद लीन्हा ॥
अर्थ: फिर लंका में जाकर आपने भक्त विभीषण को मिलकर अभय और परम सुख दिया, और अशोक वाटिका में माता जानकी के दर्शन करके उनके पावन चरणों की सेवा का परम पद प्राप्त किया।
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा ।
अति आतुर जमकातर तोरा ॥
अर्थ: आपने रावण के अभिमान के प्रतीक अशोक वाटिका के बाग को उजाड़कर उसके फल-वृक्षों को समुद्र में फेंक दिया और रक्षकों के तीखे अस्त्र-शस्त्रों (यमकातरो) को तत्काल तोड़ डाला।
अक्षय कुमार मारि संहारा ।
लूम लपेटि लंक को जारा ॥
अर्थ: रावण के पराक्रमी पुत्र अक्षय कुमार का वध करके संहार किया, और अपनी पूंछ में बंधी अग्नि से देखते ही देखते सोने की समूची लंका नगरी को जलाकर भस्म कर दिया।
लाह समान लंक जरि गई ।
जय जय धुनि सुरपुर नभ भई ॥
अर्थ: लाक्षागृह के समान पूरी लंका धू-धू कर जल उठी और आपके इस अलौकिक पराक्रम को देखकर स्वर्गलोक और आकाश में समस्त देवताओं ने आपकी जय-जयकार की ध्वनि की।
अब बिलंब केहि कारन स्वामी ।
कृपा करहु उर अंतरयामी ॥
अर्थ: हे मेरे स्वामी! जब आपने पूर्व में ऐसे असंभव कार्य क्षणभर में कर दिए, तो अब मेरे संकट हरने में किस कारण से विलंब हो रहा है? हे सबके हृदय की जानने वाले अंतर्यामी प्रभु! मुझ पर शीघ्र कृपा कीजिए।
जय जय लखन प्रान के दाता ।
आतुर ह्वै दुख करहु निपाता ॥
अर्थ: लक्ष्मण जी को शक्तिबाण लगने पर संजीवनी बूटी लाकर उनके प्राणों की रक्षा करने वाले हे प्राणदाता! आपकी जय हो, जय हो! अब व्याकुल होकर मेरे इस असह्य दुःख का तत्काल विनाश कर दीजिए।
जै हनुमान जयति बल सागर ।
सुर समूह समरथ भटनागर ॥
अर्थ: हे अतुलित बल के सागर, समस्त देवताओं के समूह में परम समर्थ और वीरों में श्रेष्ठ चतुर योद्धा श्री हनुमान जी! आपकी सर्वत्र जय-जयकार हो।
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले ।
बैरिहि मारु बज्र की कीले ॥
अर्थ: हे प्रण के पक्के, अपने भक्तों की रक्षा के लिए हठपूर्वक तत्पर रहने वाले हठीले हनुमान जी! आप 'हं' बीजमंत्र के दिव्य तेज से मेरे समस्त आंतरिक व बाह्य शत्रुओं पर वज्र के समान तीक्ष्ण कीलें ठोककर उन्हें नष्ट कर दीजिए।
गदा बज्र लै बैरिहिं मारो ।
महाराज प्रभु दास उबारो ॥
अर्थ: अपने पावन हाथों में वज्र के समान कठोर गदा लेकर समस्त दुष्टों, विघ्नों और शत्रुओं का संहार कीजिए। हे महाराजाधिराज! अपने इस दीन सेवक को इस संकट के सागर से उबार लीजिए।
ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो ।
बज्र गदा हनु बिलंब न लावो ॥
अर्थ: प्रणव ओंकार और हुंकार की सिंहगर्जना करते हुए हे महाप्रभु! रक्षा हेतु दौड़िए। अपनी वज्र गदा से आसुरी शक्तियों का दमन कीजिए और किंचित् भी विलंब मत कीजिए।
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा ।
ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा ॥
अर्थ: ह्रीं-बीज-स्वरूप हे वानरराज कपीश्वर! और हुं-बीज के महातेज से आप मेरे शत्रुओं की छाती (उर) और मस्तक (शीश) पर तीक्ष्ण आघात करके उनके दर्प को चूर-चूर कर दीजिए।
सत्य होहु हरि शपथ पाइ कै ।
राम दूत धरु मारु धाइ कै ॥
अर्थ: भगवान श्री हरि के नाम की पावन शपथ स्मरण करके अपने वचनों को सत्य सिद्ध कीजिए। हे प्रभु श्री राम के अमोघ दूत! संकटों और दुष्ट प्रवृत्तियों को पकड़कर दौड़कर उनका विनाश कीजिए।
जय जय जय हनुमंत अगाधा ।
दुख पावत जन केहि अपराधा ॥
अर्थ: हे असीम, अथाह और अनंत महिमा वाले श्री हनुमान जी! आपकी सदा जय हो। हे प्रभु! जब आपका यह दास आपकी शरण में है, तो फिर किस अपराध के कारण उसे यह असह्य दुःख भोगना पड़ रहा है?
पूजा जप तप नेम अचारा ।
नहिं जानत कछु दास तुम्हारा ॥
अर्थ: हे कृपानिधान! मैं आपका अबोध दास हूँ; मैं न तो कोई कठिन पूजा जानता हूँ, न मंत्र-जप, न कठोर तपस्या और न ही शास्त्रोक्त नियम व आचार। मैं केवल आपकी शरणागति जानता हूँ।
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं ।
तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं ॥
अर्थ: चाहे हम घने जंगल में हों, उपवन में हों, निर्जन मार्ग पर हों, ऊंचे पर्वत पर हों या अपने घर के भीतर हों—हे महावीर! केवल आपके असीम बल और कृपा के सहारे हम किसी भी संकट या भय से नहीं डरते।
पांय परौं कर जोरि मनावौं ।
यहि अवसर अब केहि गोहरावौं ॥
अर्थ: मैं आपके पावन चरणों में शीश नवाता हूँ और दोनों हाथ जोड़कर आपको मनाता हूँ। हे प्रभु! जीवन के इस विषम संकट काल में आपके अतिरिक्त मैं और किस द्वार पर जाकर गुहार लगाऊं?
जय अंजनि कुमार बलवंता ।
शंकरसुवन बीर हनुमंता ॥
अर्थ: माता अंजनी के तेजस्वी एवं महाबलशाली पुत्र, भगवान देवाधिदेव शंकर के रुद्रावतार, परम धीर-वीर श्री हनुमान जी! आपकी सदा सर्वदा जय हो।
बदन कराल काल-कुल-घालक ।
राम सहाय सदा प्रतिपालक ॥
अर्थ: दुष्टों और अधर्मियों के लिए अत्यंत विकराल रूप धारण करने वाले, काल के वंश का भी संहार करने में समर्थ, और प्रभु श्री राम के परम सहायक व भक्तों का नित्य प्रतिपालन करने वाले कृपालु प्रभु मेरी रक्षा करें।
भूत प्रेत पिसाच निसाचर ।
अगिन बेताल काल मारी मर ॥
अर्थ: भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर (राक्षसी वृत्तियां), अग्नि-भय, बेताल तथा महामारी रूपी मृत्यु तुल्य कष्ट—ये सभी आपकी हुंकार से तत्काल जलकर नष्ट हो जाएं।
इन्हें मारु तोहि सपथ राम की ।
राखु नाथ मरजाद नाम की ॥
अर्थ: हे प्रभु! आपको आपके परम आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की शपथ है, इन सभी घोर संकटों और नकारात्मक शक्तियों को मार भगाइए और अपने शरणागत-वत्सल नाम की मर्यादा की रक्षा कीजिए।
जनकसुता हरि दास कहावो ।
ताकी शपथ बिलंब न लावो ॥
अर्थ: आप जगज्जननी माता जानकी और भगवान श्री हरि के अनन्य दास कहलाते हैं। आपको माता सीता और प्रभु श्री राम की पावन सौगंध है, अब रक्षा करने में किंचित् मात्र भी देर न कीजिए।
जय जय जय धुनि होत अकासा ।
सुमिरत होत दुसह दुख नासा ॥
अर्थ: आकाशमंडल में दसों दिशाओं में आपकी दिव्य जय-जयकार की ध्वनि गूंज रही है। आपके परम पावन नाम का केवल स्मरण करने मात्र से ही बड़े से बड़ा और असह्य दुःख भी क्षणभर में नष्ट हो जाता है।
चरन सरन करि जोरि मनावौं ।
यहि अवसर अब केहि गोहरावौं ॥
अर्थ: मैं पूर्ण समर्पण के साथ आपके चरणों की शरण में आकर दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ। इस विषम संकट की घड़ी में आपके सिवा मैं अपनी व्यथा सुनाने किसके पास जाऊं?
उठु उठु चलु तोहिं राम दुहाई ।
पांय परौं कर जोरि मनाई ॥
अर्थ: हे महावीर! आपको मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की दुहाई है, अब तत्काल उठिए और अपने सेवक की रक्षा हेतु चलिए! मैं बारंबार आपके चरणों में नतमस्तक होकर हाथ जोड़कर आपको मना रहा हूँ।
ॐ चं चं चं चं चपल चलन्ता ।
ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता ॥
अर्थ: चं-कार की तीव्र चपलता से वायुवेग से चलने वाले, और हं-बीज के महाप्रचंड तेज से जाज्वल्यमान हे हनुमान जी! आप बिजली की गति से पधारकर भक्तों के संकटों को भस्म कर दीजिए।
ॐ हं हं हांक देत कपि चंचल ।
ॐ सं सं सहम पराने खल-दल ॥
अर्थ: जब आप 'हं हं' की प्रचंड सिंहगर्जना और हांक लगाते हैं, तब 'सं सं' के कम्पन से समस्त दुष्ट, तामसिक शक्तियां और शत्रुओं के समूह भयभीत होकर थर-थर कांपते हुए पलायन कर जाते हैं।
अपने जन को तुरत उबारो ।
सुमिरत होय आनंद हमारो ॥
अर्थ: हे प्रभु! अपने इस शरणागत सेवक को इस घोर संकट से तत्काल उबार लीजिए। आपके पावन स्वरूप का स्मरण करते ही हमारे हृदय में अलौकिक आनंद और शांति का संचार हो जाता है।
यहि बजरंग बाण जेहि मारो ।
ताहि कहो फिर कौन उबारो ॥
अर्थ: यह श्री बजरंग बाण जिस किसी भी विपत्ति, संकट, तामसिक शक्ति अथवा अधर्मी पर चल जाता है, इस त्रैलोक्य में फिर कोई भी शक्ति उसे बचा नहीं सकती; उसका अंत सुनिश्चित हो जाता है।
पाठ करै बजरंग बाण की ।
हनुमत रक्षा करै प्रान की ॥
अर्थ: जो भी साधक निष्ठा और पवित्रता से इस अचूक बजरंग बाण का पाठ करता है, स्वयं पवनपुत्र हनुमान जी प्रत्यक्ष ढाल बनकर उसके प्राणों, मान-सम्मान और परिवार की रक्षा करते हैं।
यह बजरंग बाण जो जापै ।
ताते भूत प्रेत सब कांपै ॥
अर्थ: जो भी मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस बजरंग बाण का जप करता है, उसके प्रभाव से समस्त भूत, पिशाच, बुरी नजर, तांत्रिक दोष और नकारात्मक शक्तियां दूर से ही थर-थर कांपने लगती हैं।
धूप देय अरु जपै हमेशा ।
ताके तन नहिं रहे कलेशा ॥
अर्थ: जो साधक शुद्ध गुग्गल-लोबान या सुगंधित धूप जलाकर नियमित रूप से इसका जप करता है, उसके शरीर, मन और जीवन में किसी भी प्रकार का कोई क्लेश, व्याधि या पीड़ा शेष नहीं रहती।
प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान ।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान ॥
अर्थ: जो भी भक्त अटूट प्रेम और दृढ़ विश्वास के साथ कपीश्वर श्री हनुमान जी का भजन करता है और सदैव अपने हृदय में उनके दिव्य स्वरूप का ध्यान रखता है, हनुमान जी उसके जीवन के समस्त शुभ और कल्याणकारी मनोरथों को निश्चित रूप से सिद्ध कर देते हैं।
श्री बजरंग बाण का महत्व एवं आध्यात्मिक रहस्य
सनातन भक्ति परंपरा में श्री बजरंग बाण (Bajrang Baan) एक ऐसा अमोघ और अत्यंत शक्तिशाली रक्षा-स्तोत्र है, जिसका संधान कभी निष्फल नहीं होता। ‘बाण’ शब्द का अर्थ ही है — लक्ष्य को भेदने वाला अचूक अस्त्र। जिस प्रकार भगवान श्री राम का बाण कभी व्यर्थ नहीं जाता, उसी प्रकार जब एक असहाय भक्त सब ओर से निराश होकर श्री हनुमान जी के समक्ष इस पावन बाण का संधान करता है, तो तीनों लोकों की कोई भी नकारात्मक शक्ति, ग्रह-दोष अथवा शत्रु उसके अनिष्ट का कारण नहीं बन सकती।
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित यह पावन पाठ भक्ति और तंत्र-विज्ञान का एक अनूठा संगम है। इसमें जहां एक ओर भक्त का दीन-भाव और पूर्ण आत्मसमर्पण है, वहीं दूसरी ओर ‘ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं’, ‘ॐ हुं हुं हुं’, ‘ॐ चं चं चं चं’ और ‘ॐ सं सं’ जैसे दिव्य वैदिक व शाबर बीजाक्षरों की शक्ति समाहित है। ये बीजाक्षर वातावरण में सूक्ष्म कम्पन उत्पन्न करके साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा-चक्र (aura of protection) निर्मित कर देते हैं, जिससे तामसिक शक्तियां तत्काल नष्ट हो जाती हैं।
इस स्तोत्र का सबसे गंभीर और चमत्कारी पहलू है — प्रभु श्री राम की दुहाई (राम-शपथ)। स्तोत्र में स्पष्ट कहा गया है — ‘इन्हें मारु तोहि सपथ राम की’ तथा ‘उठु उठु चलु तोहिं राम दुहाई’। श्री हनुमान जी के जीवन का एकमात्र ध्येय प्रभु श्री राम की सेवा और उनकी आज्ञा का पालन है। जब भक्त हनुमान जी को उनके आराध्य की सौगंध दिलाता है, तो पवनपुत्र अपने भक्त की रक्षा के लिए उसी क्षण विवश होकर बिजली की गति से दौड़े चले आते हैं। यही कारण है कि भारतीय जनमानस में बजरंग बाण को घोर संकटों से मुक्ति का परम संबल माना गया है।
श्री बजरंग बाण पाठ करने की प्रामाणिक विधि एवं आवश्यक नियम
श्री बजरंग बाण अत्यंत तेजस्वी एवं उग्र प्रभाव वाला पाठ है। इसका पाठ करते समय नियमों और शुचिता का पालन करना अनिवार्य है ताकि साधक को केवल शुभ और कल्याणकारी फल प्राप्त हों। पाठ की शास्त्रसम्मत विधि निम्नलिखित है:
- संकल्प एवं मानसिक शुचिता: पाठ आरंभ करने से पूर्व मन को शांत करें और किसी भी प्रकार के द्वेष, क्रोध या अनुचित कामना से मुक्त रहें। बजरंग बाण का पाठ सदैव सात्त्विक भाव, आत्मरक्षा, रोग-निवारण और संकट-मुक्ति के लिए ही करें।
- शुभ दिन एवं समय: इसका पाठ विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार को करना अत्यंत फलदायी होता है। इसके अतिरिक्त हनुमान जयंती, नवरात्रि अथवा संकट के समय इसका पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है। समय के दृष्टिकोण से प्रातःकाल सूर्योदय के समय अथवा सायं काल में गोधूलि वेला व रात्रि का समय श्रेष्ठ है।
- आसन एवं दिशा: स्नानोपरांत शुद्ध लाल अथवा नारंगी वस्त्र धारण करें। लाल रंग के ऊनी या कुशा के आसन पर बैठें। अपना मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखें।
- दीप एवं धूप प्रज्वलन: श्री हनुमान जी के चित्र अथवा विग्रह के सम्मुख चमेली के तेल का अथवा शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। वातावरण की शुद्धि हेतु शुद्ध गुग्गल अथवा धूप अवश्य दें, जैसा कि फलश्रुति में कहा गया है — ‘धूप देय अरु जपै हमेशा’.
- भोग एवं अर्पण: प्रभु को सिंदूर, लाल पुष्प, गुड़-चना, तुलसी दल अथवा बूंदी का नैवेद्य अर्पित करें।
- पाठ संख्या एवं सावधानियां: सामान्य संकट में १, ७ या ११ बार पाठ करें। किसी विशेष अनुष्ठान में २१ दिन तक नित्य ११ पाठ करना अत्यंत सिद्धिकारक माना गया है। विशेष सावधानी: किसी को पीड़ा पहुंचाने, अनुचित लाभ प्राप्त करने या तामसिक उद्देश्यों के लिए बजरंग बाण का पाठ कदापि न करें; ऐसा करने पर साधक को स्वयं हानि उठानी पड़ सकती है।
श्री बजरंग बाण पाठ के अद्भुत एवं चमत्कारी लाभ
नियम और निष्ठापूर्वक श्री बजरंग बाण का अनुष्ठान करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- समस्त नकारात्मक ऊर्जा व भय का समूल नाश: स्तोत्र उद्घोष करता है — ‘यह बजरंग बाण जो जापै, ताते भूत प्रेत सब कांपै’. घर में यदि किसी प्रकार की नकारात्मकता, ऊपरी बाधा, बुरी नजर या अज्ञात भय का वास हो, तो इसके नित्य पाठ से वह तत्काल विसर्जित हो जाती है।
- शत्रु बाधा एवं षड्यंत्रों से अभयदान: यदि कोई शत्रु अकारण परेशान कर रहा हो, झूठे मुकदमों या विवादों में फंसाने का प्रयास कर रहा हो, तो बजरंग बाण ढाल बनकर साधक की रक्षा करता है और विरोधियों के अनुचित प्रयासों को निष्फल कर देता है।
- असाध्य व्याधियों और अकाल संकटों से रक्षा: ‘पाठ करै बजरंग बाण की, हनुमत रक्षा करै प्रान की’. गंभीर बीमारियों, दुर्घटनाओं और प्राण संकट की दशा में यह पाठ संजीवनी बूटी के समान कार्य करके साधक को नया जीवन और आरोग्य प्रदान करता है।
- शनि की साढ़ेसाती व राहु दोष की शांति: ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, कुंडली में राहु-केतु के अशुभ प्रभाव, कालसर्प दोष तथा शनि देव की साढ़ेसाती व ढैय्या की पीड़ा को शांत करने में यह पाठ रामबाण माना गया है।
- आत्मविश्वास और मानसिक दृढ़ता का उदय: जो व्यक्ति नित्य अवसाद, हीनभावना या अनिर्णय की स्थिति से जूझते हैं, बजरंग बाण का पाठ उनके भीतर महावीर हनुमान जी के समान असीम आत्मबल, साहस और सकारात्मक तेज भर देता है।
श्री हनुमान जी के अन्य पावन पाठ (Deity Cluster)
पवनपुत्र श्री हनुमान जी की संपूर्ण कृपा और नित्य सान्निध्य प्राप्त करने हेतु चालीसा सागर पर उपलब्ध इन अन्य पावन पाठों का भी नियमपूर्वक अध्ययन करें:
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्र.श्री बजरंग बाण का पाठ कब और किन परिस्थितियों में करना चाहिए?
श्री बजरंग बाण का पाठ सामान्यतः तब किया जाता है जब साधक किसी अत्यंत गंभीर संकट, अकारण भय, शत्रु बाधा, तांत्रिक व नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव, अथवा असाध्य शारीरिक-मानसिक पीड़ा से घिर गया हो। जहां सामान्य उपायों से राहत न मिल रही हो, वहां शुद्ध अंतःकरण और पूर्ण श्रद्धा से किया गया बजरंग बाण का पाठ अचूक अस्त्र की भांति कार्य करके तत्काल रक्षा प्रदान करता है।
प्र.क्या बजरंग बाण का पाठ नित्य प्रतिदिन सामान्य पूजा में करना चाहिए?
शास्त्रों एवं आचार्यों के मतानुसार, नित्य सामान्य दैनिक पूजा के लिए 'श्री हनुमान चालीसा' और 'संकट मोचन हनुमानाष्टक' का पाठ सर्वोत्तम माना गया है। बजरंग बाण में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम और माता जानकी की पावन शपथ ('तोहि सपथ राम की') दी जाती है, इसलिए इसका पाठ नित्य बिना कारण करने के स्थान पर विशेष संकट, मंगलवार-शनिवार के अनुष्ठान, अथवा विषम परिस्थितियों में ही श्रद्धापूर्वक करना चाहिए।
प्र.बजरंग बाण का पाठ करते समय कौन सी मुख्य सावधानियां और नियम बरतने चाहिए?
बजरंग बाण का पाठ करते समय पूर्ण शारीरिक व मानसिक शुचिता, ब्रह्मचर्य का पालन, तथा सात्त्विक खान-पान अनिवार्य है। लाल रंग के आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें। चमेली के तेल अथवा शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि इसका प्रयोग कभी भी किसी के अहित, बदले की भावना या अनुचित स्वार्थ के लिए न करें; यह केवल आत्मरक्षा और धर्म की रक्षा के लिए विहित है।
प्र.बजरंग बाण में 'तोहि सपथ राम की' और तांत्रिक बीजाक्षरों का क्या आध्यात्मिक रहस्य है?
बजरंग बाण में 'ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं', 'ॐ हुं हुं हुं', 'ॐ चं चं चं चं' और 'ॐ सं सं' जैसे शक्तिशाली वैदिक व शाबर बीजाक्षरों का समावेश है, जो वातावरण की तामसिक तरंगों को तत्काल भस्म कर देते हैं। साथ ही, प्रभु श्री राम की शपथ स्मरण कराने से हनुमान जी अपने अनन्य सेवक भाव के कारण तनिक भी विलंब किए बिना बिजली की गति से भक्त की रक्षा हेतु दौड़े चले आते हैं।
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